सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

चे के दीवानों के लिए खास

आज के दिन चे ग्वेरा को बोलीविया की सेना ने गोली मार दी थी। उन्हें एक दिन पहले सही सलामत पकड़ लिया गया था। बावजूद इसके उन्हें गोली मार देने का फैसला हुआ। यहां मैं मशहूर अखबार गार्जियन के लिए रिचर्ड गॉट की उस रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद पेश कर रहा हूं जो चे की मौत के बाद तुरंत बाद लिखी गई थी। मुझे विश्वास है ये आपके लिए किसी दस्तावेज़ की तरह होगी। रिपोर्ट बॉलीविया के वेलेग्राण्ड में 10 अक्टूबर 1967 को लिखी गई थी। अनुवादक रघुवंश मणि हैं।
पिछली रात पाँच बजे चे ग्वेरा का पार्थिव शरीर दक्षिणी-पश्चिमी बोलीविया के इस पहाड़ी कस्बे में लाया गया।
हेलिकाप्टर से स्ट्रेचर पर बंधे छोटे शरीर के लैंडिंग रेलिंग पर उतरने के साथ ही बाद की सारी कार्रवाही का दायित्व एक सैनिक वर्दी वाले व्यक्ति को सौंप दिया गया जिसके बारे में सभी पत्रकारों का मत है कि वह नि:सन्देह अमेरिका की किसी गुप्तचर एजेन्सी का प्रतिनिधि है। वह सम्भवत: कोई क्यूबन निर्वासित है और इस प्रकार जीवन भर अकेले ही संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुध्द युध्द छेड़ने वाले चे ग्वेरा ने मृत्यु के पश्चात स्वयम् को अपने प्रमुख शत्रु के सामने पाया।
हेलिकाप्टर को जानबूझ कर उस जगह से दूर उतारा गया जहाँ भीड़ एकत्रित थी और मृत गोरिल्ला युध्द के नायक के शरीर को जल्दी से एक वैन में पहुँचाया गया। हमने एक जीप से उसका पीछा करने को कहा और ड्राइवर उस हास्पिटल के गेट से निकलने में सफल रहा जहाँ उनके शरीर को एक छोटे से रंगीन वाश हट में ले जाया गया जो शवगृह के रूप में इस्तेमाल होता था।
वैन के दरवाजे खुले और अमेरिकी एजेन्ट चीखते हुए बाहर कूदा और चिल्लाया 'इसे जल्दी से बाहर करो।' एक पत्रकार ने उससे पूछा कि वह कहाँ से आया है। उसने गुस्से में जवाब दिया, 'कहीं से नहीं।'
ओलिव हरे रंग की फैटिग और जिपर्ड जैकेट पहने पार्थिव शरीर को उस झोपड़ी में ले जाया गया। यह सुनिश्चित तौर पर चे ग्वेरा का ही पार्थिव शरीर था। जब पहली बार मैने जनवरी में उनके बोलिविया में होने की बात अपनी रिर्पोट में लिखी थी, तभी से मैं लोगों की इस बात पर यकीन नहीं करता था कि वे कहीं और हैं।
मैं सम्भवत: उन कतिपय लोगों में से हूँ जिन्होने उन्हें जीवित देखा था। मैने उन्हे क्यूबा में 1963 में एम्बेसी के एक रिसेप्शन पर देखा था और मुझे कोई सन्देह नहीं कि यह चे ग्वेरा का ही पार्थिव शरीर है। काली घुंघराली दाढ़ी, उलझे बाल और दायीं कनपटी पर एक घाव है जो शायद जुलाई की एक दुर्घटना का परिणाम है जब उन्हें एक राइफल की गोली छूकर निकल गयी थी।
उनके पैरों मे मोकासिन्स थीं मानों जंगल में तेजी से दौड़ते समय उन्हे गोली मारी गयी हो। उनके गर्दन के निचले हिस्से में दो गोलियों के लगने के निशान थे और शायद एक गोली उनके पेट में भी मारी गयी थी। ऐसा विश्वास है कि उन्हे तब पकड़ा गया जब वे गंभीर रूप से घायल थे, लेकिन उन्हे युध्द क्षेत्र से बाहर निकालने वाले हेलिकाप्टर के आने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी थी।
मुझे केवल एक बात को लेकर उनकी पहचान पर संदेह था। मेरी स्मृति की तुलना में चे पहले से काफी दुबले हो गये थे, लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि महीनों जंगल में रहने के कारण उनके पहले के भारी शरीर में यह बदलाव आया होगा।
जैसे ही पार्थिव शरीर शवगृह में पहुँचा डाक्टरों ने उसमें प्रिजर्वेटिवस डालने और अमेरिकन एजेन्ट ने लोगों को दूर रखने के निष्फल प्रयास करने प्रारम्भ किये। वह बहुत परेशान था और जब भी उसकी ओर कैमरा होता था, वह क्रुध्द हो जाता था। उसे पता था कि मैं जानता हॅॅूं कि वह कौन है। उसे यह भी पता था कि मैं जानता हॅॅूं कि उसे यहाँ नहीं होना चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा युध्द था जिसमें अमेरिकी लोगों के होने की आशा नहीं की जाती था।
फिर भी यह शख्स उपस्थित था जो वेलेग्राण्ड में सेना के साथ था और अफसरों से परिचितों की तरह बातें कर रहा था।
शायद ही कोई यह कहे कि चे को ये बातें मालूम न थीं क्योंकि उनका उद्देश्य ही अमेरिका को लाटिन अमेरिका में हस्तक्षेप के लिए उत्तेजित करना था ताकि युध्द पीड़ित वियतनाम को मदद मिल सके। लेकिन वे निश्चित रूप से महाद्वीप में अमेरिकी गुप्तचर एजेसियों की ताकत और पहुँच का ठीक-ठीक अंदाजा लगाने में चूक गये और यही उनके और वोलीवियायी गुरिल्लाओं की असफलता का प्रमुख कारण बना।
अब उनकी मृत्यु हो चुकी है। जब उनके शरीर में प्रिजवेटिव्स भरे जा रहे हैं और भीड़ अन्दर आने के लिए चीख रही है, यह सोचना कठिन है कि यह व्यक्ति एक समय लाटिन अमेरिका के महान लोगों में से एक था।
वह मात्र एक महान गुरिल्ला नायक नहीं थे, वे क्रान्तिकारियों और राष्ट्रपति के मित्र भी थे। उनकी आवाज को अन्तर-अमेरिकी कौंसिल्स के अतिरिक्त जंगलों में भी सुना-समझा जाता था। वे एक डाक्टर, गैरपेशेवर अर्थशास्त्री, क्रान्तिकारी क्यूबा में उद्योग मंत्री और फिडल कास्त्रो के दाये हाथ थे। सम्भवत: उन्हे इतिहास में बोलिवर के बाद का सबसे महत्वपूर्ण महाद्वीपीय व्यक्तित्व माना जाय। उनके नाम के चारो ओर गाथाएँ रची जानी हैं।
वे चीनियों और रूसियों के बीच चल रहे सैध्दान्तिक झगड़ों से परेशान र्माक्सवादी थे। वे सम्भवत: अन्तिम व्यक्ति थे जिन्होने दोनों के बीच का रास्ता खोजने की कोशिश की और सभी जगहों पर संयुक्त राज्य के विरुध्द क्रान्तिकारी ताकतों को एकत्र करने की मुहिम चलायी। वे अब मृत हैं लेकिन यह सोचना कठिन है कि उनके विचार भी उनके साथ मर जायेंगे।

(इति इतिहास श्रृंखला)

चे की 50वीं पुण्यतिथि ..

बेतरतीब दाढ़ी, सितारे लगी टोपी, मुंह में सिगार और पांव में ऊंचे जूते.. ये आदमी कई पीढ़ियों के ज़हन में है। भले नाम तुरंत याद ना आए तो भी कोई नहीं कह सकता कि मैंने इस आदमी को नहीं देखा। किसी का अंदाज़ा है कि ये कोई पॉप स्टार है तो किसी ने इसे अमेरिकी हीरो बताया। अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन अमेरिकी यूथ में आज खूब पसंद किया जाता है। टीशर्ट, जूते, हेलेमेट, लाइटर.. किसी भी चीज़ पर आप उसके चेहरे का दीदार कर सकते हैं। जाने-अनजाने कई पीढ़ियां उससे वाकिफ रही हैं। ये चे है.. अर्नेस्तो चे ग्वेरा।
अर्नेस्तो ‘चे’ ग्वेरा ने क्यूबा का ना होकर भी वहां हुई सशस्त्र क्रांति में अहम रोल निभाया था। फिदेल कास्त्रो ने सरकार बनाई तो दूसरे देशों से संंबंध स्थापित करने का ज़िम्मा उन्हें ही सौंपा। नेहरू सरकार ने चे को विशेष आमंत्रण भेजा और 30 जून 1959 को वो दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पहुंचे थे। किसी रॉकस्टार सरीखे दिखते चे की अगवानी प्रोटोकॉल ऑफिसर डी एस खोसला ने की थी। 1 जुलाई 1959 को चे और नेहरू की मुलाकात हुई औऱ उन्होंने साथ ही खाना खाया। वो दिल्ली के करीब पिलाना गांव भी गए थे। कमाल ये है कि चे की इस दौरे की जानकारी उन्हें चाहनेवालों को भी नहीं है। लोगों को ये बात हैरान करती है कि वो कभी भारत आए थे। यहां फाइल्स में उनका नाम अर्नेस्ट गेवारा दर्ज है। दिल्ली ही नहीं चे कलकत्ता भी गए और उसके अलावा कई और शहरों में भी। उनके इस दौरे की जानकारियां संजोने का काम किसी ने भी ठीक से नहीं किया। चे के संग्रह में वो तस्वीरें भी हैं जो उन्होंने कलकत्ता की सड़कों पर खींची। वो बंगाल के मुख्यमंत्री से भी मिले थे लेकिन ये बात फिर हैरान करती है कि वामपंथियों तक ने चे के दौरे पर कभी विस्तार से लिखना ज़रूरी नहीं समझा। खैर जब चे क्यूबा लौटे तो अपनी रिपोर्ट कास्त्रो को सौंपी। उसमें उन्होंने भारत के बारे में काफी कुछ लिखा है। सबसे अहम ये है कि खुद हथियार लेकर क्रांति करनेवाले चे ने गांधी के सत्याग्रह के प्रति आदर का भाव प्रकट किया। ओम थानवी के एक लेख के मुताबिक चे ने रिपोर्ट में लिखा- ‘‘जनता के असंतोष के बड़े-बड़े शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अंग्रेजी उपनिवेशवाद को आखिरकार उस देश को हमेशा के लिए छोड़ने को बाध्य कर दिया, जिसका शोषण वह पिछले डेढ़ सौ वर्षों से कर रहा था।’’ 

तीन मूर्ति भवन में ऐतिहासिक मुलाकात
के पी भानुमति ने ऑल इंडिया रेेडियो के लिए उनका साक्षात्कार दिल्ली के अशोका होटल में लिया था जहां वो ठहरे थे। चे ने तब उनसे कहा था - ‘आपके यहां गांधी हैं, दर्शन की एक पुरानी परंपरा है। हमारे लैटिन अमेरिका में दोनों नहीं हैं। इसलिए हमारी मन:स्थिति ही अलग ढंग से विकसित हुई है।’
कमाल देखिए कि चे ग्वेरा भारतीयों को युद्ध से दूर रहनेवाला मानते थे। उन्होंने रिपोर्ट में लिखा था - 'भारत में युद्ध शब्‍द वहां के जनमानस की आत्‍मा से इतना दूर है कि वह स्‍वतंत्रता आंदोलन के तनावपूर्ण दौर में भी उसके मन पर नहीं छाया।' अगर चे आज भारत का दौरा करते तो शायद भारत को लेकर उनकी बहुत सी राय बदल जाती। आज चे की 50वीं पुण्यतिथि है। क्यूबा में ऐशो आराम के जीवन से विदाई लेकर चे बोलिविया में सशस्त्र क्रांति की कोशिश में जुट गए थे. 8 अक्टूबर 1967 को महज़ 39 साल की उम्र में गरीबों की ओर से लड़कर क्रांति लाने का प्रयास करते चे को बॉलीवियिन सेना ने घेरकर पकड़ लिया. खबर ऊपर तक पहुंची तो हत्या करने का फैसला हुआ. पहले चे को कमर से नीचे गोलियों से भून दिया गया और फिर तड़पते वक्त सीने में गोली उतार दी गई. चे का शव दो दिनों तक अफसरों और पत्रकारों के सामने नुमाइश के लिए रखा गया। इसके बाद हाथ काट कर गुमनाम जगह दफना दिया गया. उसके साथ दूसरे विद्रोहियों को भी दफन किया गया था. करीब तीस साल बाद क्यूबा को चे के अवशेष दिए गए तब हाथ कटे कंकाल से ही वो पहचाना गया था. चे पर भी हत्याओं के संगीन आरोप थे मगर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए चे ने यही चुना था. मानव को बंधन से आज़ाद कराने के लिए चे ने घर, पेशा और देश तक छोड़ दिया था। आखिरकार अपने हिस्से की नौ गोलियां झेलकर वो मुक्त हो गए।

(इति इतिहास श्रृंखला)
और फिर दर्दनाक अंत





बच्चों को वक्त से पहले बड़ा मत बनाइए..

एडोल्फ हिटलर के पगलाए राष्ट्रवाद में सारा जर्मनी कूद पड़ा था। जब जर्मन सैनिक एक एक करके मरने लगे और हिटलर का मायाजाल टूटने लगा तो जर्मन सेना ने छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी भर्ती खोल दी। आखिरी सांस ले रही नाज़ी सरकार को शर्म नहीं आई और उसने राष्ट्र के नाम पर बच्चों तक को हथियार थमाकर युद्ध में भेज दिया। ये तस्वीर सोलह साल के हैन्स जॉर्ज हेंक की है जिसे हथियार देकर लड़ने को कहा गया। वो अपने देश के ही हेसन में जंग करता हुआ पकड़ लिया गया था। जब पकड़ा गया तो ज़ार ज़ार रोने लगा। बच्चा ही तो था, रोना बनता भी था। तभी ये तस्वीर ले ली गई। बेचारे के पिता 1938 में मर गए थे। मां भी 1944 में चल बसी। गुज़ारे के लिए कुछ करना था तो उसने 15 साल की उम्र में जर्मनी की वायु सेना में एंटी एयर स्क्वैड ज्वाइन कर लिया। साल भर लड़ा और फिर जर्मनी युद्ध हार गया। सोवियत सेना ने जर्मनी में घुसकर सबको घेर लिया था, वो उन्हीं में से एक था। 

16 साल के हैन्स जॉर्ज हेंक
फोटो अमेरिकी फोटोग्राफर जॉन फ्लोरिया ने लिया था। हैंस ने आगे चलकर कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन की और 1997 तक जिए। ये तस्वीर कई भावनाएं उजागर करती है। सबसे बड़ी तो यही कि बच्चे को आप कितना भी राष्ट्रवाद सिखा दें लेकिन दिल से वो बच्चा ही होता है। पकड़े जाने पर वो बच्चे की ही तरह फूट पड़ा। बच्चे को बच्चा ही रहने दें। अपने पागलपन में उनको सनकी नहीं बनाना चाहिए। अपने बच्चों को भी बचाइए अगर आपको लग रहा हो कि वो बचपन में ही बड़ों जैसी बातें कर रहा है.. मरने -मारने, कटने-काटने की..

इति इतिहास श्रृंखला 

हैन्स जॉर्ज हेंक 1997 तक जिए

इतिहास की किताब से निकली सबसे दर्दनाक तस्वीर..

‘’मैंने एक दस साल के लड़के को आते देखा। वो एक छोटे बच्चे को पीठ पर लादे हुए था। उन दिनों जापान में अपने छोटे भाई-बहनों को खिलाने के लिए अक्सर बच्चे ऐसा करते ही थे, लेकिन ये लड़का अलग था। वो लड़का यहां एक अहम वजह से आया था। उसने जूते नहीं पहने थे। चेहरा एकदम सख्त था। उसकी पीठ पर लदे बच्चे का सिर पीछे की तरफ लुढ़का था मानो गहरी नींद में हो। लड़का उस जगह पर पांच से दस मिनट तक खड़ा रहा। इसके बाद सफेद मास्क पहने कुछ आदमी उसकी तरफ बढ़े और चुपचाप उस रस्सी को खोल दिया जिसके सहारे बच्चा लड़के की पीठ से टिका था। मैंने तभी ध्यान दिया कि बच्चा पहले से ही मरा हुआ था। उन आदमियों ने निर्जीव शरीर को आग के हवाले कर दिया। लड़का बिना हिले सीधा खड़ा होकर लपटें देखता रहा। वो अपने निचले होंठ को इतनी बुरी तरह काट रहा था कि खून दिखाई देने लगा। लपटें ऐसे धीमी पड़ने लगी जैसे छिपता सूरज मद्धम पड़ने लगता है। लड़का मुड़ा और चुपचाप धीरे धीरे चला गया। ‘’



जो तस्वीर आप देख रहे हैं ये उस तस्वीर की ही कहानी है। कहानी बतानेवाले शख्स थे जो ओ डोनल। डोनल को अमेरिकी सेना ने द्वीतीय विश्व युद्ध में जापान भेजा था ताकि वो वहां जाकर अपने कैमरे में उस विभीषिका को कैद कर सकें जिसे खुद अमेरिका ने फैलाया था। इस तस्वीर को डोनल ने नागासाकी में खींचा था। साल 1945 रहा होगा, क्योंकि डोनल ने सात महीनों तक पूरे पश्चिमी जापान में घूमकर विनाशलीला को तस्वीरों में कैद किया था। इस दौरान उनकी तस्वीरों में मानव इतिहास का सबसे भयावह और दर्दनाक दौर कैद हुआ था। लाश, घायल लोग, अनाथ बच्चे, बेघर परिवार.. चारों तरफ जापान में सिर्फ यही था।
सालों बाद जो ओ डोनल से एक जापनी पत्रकार ने इंटरव्यू लिया था। तब उन्होंने इस तस्वीर की जो कहानी बयां की थी वही मैंने ऊपर लिखी है।
कहीं पढ़ा था कि 1988 में आई जापानी फिल्म ‘ग्रेव ऑफ द फायरफ्लाइज़’ में बिलकुल ऐसी ही कहानी फिल्माई गई थी। वो फिल्म एक जवान भाई और उसकी छोटी बहन के बारे में थी जो द्वितीय विश्वयुद्ध में अपनी जान बचाने का कड़ा संघर्ष करते हैं।


(इति इतिहास श्रृंखला)

इतिहास की किताब से निकली सबसे प्यारी तस्वीर..

इंटरनेट की गलियों से गुज़रते हुए एक बहुत प्यारी तस्वीर से सामना हुआ। तस्वीर आपके सामने पेश कर रहा हूं। दूसरे विश्व युद्ध का ज़माना था। सिपाही अपनी प्रेमिकाओं और पत्नियों को अलविदा कहकर ऐसे सफर पर निकल रहे थे जिससे लौट आने का कोई भी वादा झूठा साबित होना था। जंग से पहले विदाई की इस तस्वीर के साथ साहिर लुधियानवी साहब की मशहूर कविता 'खून फिर खून है' की चंद पंक्तियां साझा कर रहा हूं। युद्ध की हुंकार भरते दिमागों में कोई बात बैठाना यूं तो मुश्किल है, लेकिन इंसान का जीवन बदलावों की किताब है सो कोशिश अपनी मुसलसल जारी है। उम्मीद है कि तस्वीर और कविता आपको ठंडक पहुंचाएगी।
बम घरों पर गिरें या सरहद पर
रूहे–तामीर ज़ख्म खाती है
खेत अपने जले कि औरों के
ज़ीस्त फ़ाकों से तिलमिलाती है..
जंग तो खुद ही एक मअसला है
जंग क्या मअसलों का हल देगी
आग और खून आज बख्शेगी
भूख और अहतयाज कल देगी..
बरतरी के सुबूत की खातिर
खूँ बहाना ही क्या ज़रूरी है
घर की तारीकियाँ मिटाने को
घर जलाना ही क्या ज़रूरी है..
इसलिए, ऐ शरीफ़ इंसानों!
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शम्मां जलती रहे तो बेहतर है..

(इति इतिहास श्रृंखला)

जब टकरा गया नाज़ी हुकूमत से प्यार...

बात ज़रा लंबी है लेकिन आज के दौर में काम की है। मेरी इस पोस्ट में कुछ तस्वीरें और एक कहानी है। ये तस्वीरें और कहानी मानव इतिहास का वो दस्तावेज़ हैं जिन पर हमें नाज़ होगा। पहले आपको कहानी सुना देता हूं ताकि तस्वीरें समझने में मदद मिले।
दोनों हाथ छाती पर बांधे ये आदमी ऑगस्ट लैंडमेसर है। जब उसके चारों तरफ लोग नाज़ी सैल्यूट कर रहे हैं तब वो अपने आसपास के शोर से बेपरवाह धूप में आंखें मिचमिचाए खड़ा है। जिस सीने के आगे उसने हाथ बांधे हैं उसमें धधकते विरोध को तब शायद लोगों ने ना समझा हो पर 22 मार्च 1991 के दिन जब Die Zeit (द टाइम्स) में ये तस्वीर छपी तो अचानक खलबली मच गई। लोगों को पहली बार ऑगस्ट के बारे में मालूम पड़ा। अहसास हुआ कि जब पूरा जर्मनी नाज़ी रंग में रंगा था उस वक्त एक आदमी ऐसा भी था जिसने अपना हाथ सलामी में नहीं उठाया। तस्वीर खिंची थी 13 जून 1936 को। हर कोई जानता था कि जिस दौर में ऑगस्ट ने नाज़ी सलामी नहीं दी थी तब ऐसा करने का मतलब क्या था? ऑगस्ट तब पानी के जहाज बनाने वाली कंपनी में कर्मचारी था। मौका था एक ताकतवर जहाज होर्स्ट वेसेल की लॉन्चिंग का। उसने साल 1931 में ही नाज़ी पार्टी की सदस्यता ले ली थी ताकि नौकरी पाने में कोई मदद मिल सके, लेकिन 1935 में एक यहूदी लड़की इरमा एकलर से सगाई के बाद पार्टी ने उसे निकाल बाहर किया। वो दोनों शादी करना चाहते थे लेकिन नाज़ी लोग रक्त शुद्धता के सिद्धांत में बड़ा भरोसा करते थे। वो मानते थे कि नाज़ी शुद्ध आर्य हैं और उनकी शादियां यहूदियों से नहीं होनी चाहिए। ये उनकी तरह का लव जिहाद था। बहरहाल, 15 सितंबर 1935 को जर्मनी में न्यूरेमबर्ग कानून लागू हो गया जो इस तरह की शादियों को गैर कानूनी ठहराता था। नतीजतन दोनों ने बिना शादी के साथ रहने का फैसला किया। इस कानून के लागू होने के महीने भर बाद ही इरमा ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया। ऑगस्ट जर्मनी में रह तो रहा था लेकिन तानाशाही से ऊब चुका था। उसे हिटलर के तौर तरीके नापसंद थे। आखिरकार 1937 में उसने परेशान होकर जर्मनी छोड़ने का फैसला किया और परिवारके साथ डेनमार्क जाने का मन बनाया। उसकी बदकिस्मती थी कि वो सरहद पर पकड़ा गया और नस्ल को बेइज़्ज़त कराने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया। एक साल तक उसका ट्रायल चलता रहा और अंत में उसे सबूतों के अभाव में सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।
ऑगस्ट की ऐतिहासिक फोटो
परेशानियों का अंत नहीं था। वो अपने प्यार को छोड़ने के लिए राजी नहीं था। नाज़ियों की हर धमकी को वो उड़ाता ही चला जा रहा था। सरकार ने 1938 में उसे पकड़कर तीन सालों के लिए यातनागृह में भेज दिया। ये वही बदनाम यातनागृह थे जिनकी कल्पना आ भी रूह कंपकंपा देती है। इस सज़ा के बाद ऑगस्ट कभी अपने प्यार इरमा से मिल ना सका।
सीक्रेट पुलिस ने इरमा को भी नहीं बख्शा था। सात महीने की गर्भवती इरमा को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया जहां उसने आईरीन को जन्म दिया। इसके बाद जल्द ही इरमा को एक यातनागृह में ट्रांसफर कर दिया गया जिसके बाद वो 14 हज़ार दूसरी महिलाओं के साथ कहां गई आप समझ सकते हैं।
ऑगस्ट की ऐतिहासिक फोटो
साल 1941 में ऑगस्ट जेल से बाहर आया। उसने फोरमैन के तौर पर नौकरी शुरू की। दो ही साल बीते थे कि उसे पीनल इन्फैंट्री में नौकरी करने के लिए मजबूर किया गया। ये सेना का वो हिस्सा था जहां उन लोगों को काम करने के लिए मजबूर किया जाता था जिन्हें किसी मामले में सज़ा दी गई हो। क्रोएशिया में ही वो गुम हो गया जिसके बाद मान लिया गया कि वो मर गया। लाश मिलने का तो सवाल था ही नहीं। साल 1949 में दोनों पति-पत्नी को औपचारिक तौर पर मृत घोषित कर दिया गया और इस तरह नाज़ी जर्मनी में घटी आर्य और यहूदी जोड़े की प्रेम कहानी का अंत हो गया।
इरमा एकलर
ऑगस्ट और इरमा की बेटियों ने अपने माता-पिता की कहानी को दिल में बसाए रखा। साल 1996 में इरीन ने एक किताब छपवाई जिसमें इस कहानी से जुड़े तमाम सबूत थे। जिसने भी बहादुर और ज़िद्दी ऑगस्ट के बारे में पढ़ा वही अभिभूत था। ऑगस्ट अपने दौर में सरकारी प्रतिरोध की मिसाल बन गया। वो तस्वीर जिसमें सैकड़ों लोगों के बीच वो अकेला अपने सीने के सामने हाथ बांधे खड़ा है, उसी तस्वीर ने लोगों को अहसास दिलाया कि चाहे जैसा भी वक्त हो, विरोध अकेला आदमी भी कर सकता है। मेरे लिए ऑगस्ट हीरो है। चाहे उसके विरोध की वजह नितांत राजनीतिक ना होकर यही क्यों ना हो कि उसकी मुहब्बत को व्यवस्था ने स्वीकार नहीं किया। जब वो विरोध कर रहा था तब दुनिया उसके खिलाफ थी, और आज जब वो नहीं है तो उसकी तस्वीर हर उस इंसान के लिए मिसाल है जो किसी ना किसी मज़बूत व्यवस्था के खिलाफ कोई ना कोई वजह लेकर संघर्षरत है।
(जिस पानी के जहाज को ऑगस्ट के साथी सलामी दे रहे थे, दूसरी वर्ल्ड वॉर में जीत के बाद अमेरिका ने उसे अपने बेड़े में ईगल नाम से शामिल कर लिया। वो आज भी समंदर में अपने काम पर है।)
तब होर्स्ट और आज ईगल
(इति इतिहास श्रृंखला)

शुक्रवार, 16 जून 2017

गांधी, चार्ली, चर्चिल और मशीन -3

1931 में जब चार्ली चैप्लिन गांधी से मिल रहे थे तब उन्हें बाज़ार में बढ़ते मशीनीकरण के नुकसानों का उतना अंदाज़ा नहीं था। दुनिया बहुत तेज़ी के साथ मशीनों पर निर्भर होती जा रही थी। पहले विश्वयुद्ध के बाद बर्बाद हुए देश तेज़ी से खड़े होने के लिए मशीनों पर सवार थे और जर्मनी उनमें सबसे आगे था। अंग्रेज़ों ने भी मैनचेस्टर में मशीनों से कपड़ा बनाकर दुनिया में खपा दिया था, नतीजतन भारत में कपड़े बनाने वाले बर्बादी के मुहाने पर खड़े थे। गांधी ने अपनी मुलाकात में चार्ली चैप्लिन को बता दिया था कि वो क्यों मशीन के विरोधी थे। उनके लिए मशीन अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद को मज़बूत करने का टूल थी और गांधी इसी टूल से खफा थे। वहीं टॉल्स्टॉय समेत विश्व के कई चिंतक मशीनों को ऐसा खलनायक मान रहे थे जो इंसान को प्रकृति से दूर कर रही है। चैप्लिन सिनेमा के बदलते स्वरूप के साथ बदल रहे थे और वो भी कमोबेश नई मशीनों पर आधारित था। मोशन फिल्में शुरू हो चुकी थीं लेकिन खुद को नकारे जाने के डर से चैप्लिन अपनी राह चलते रहे। थोड़ी बहुत आवाज़ उनकी फिल्मों में सुनाई तो देने लगी लेकिन चैप्लिन ने उन्हें अभी भी गूंगा ही रखने का फैसला लिया। दुनिया ग्रेट डिप्रेशन से गुज़र रही थी। अमेरिका से शुरू हुआ संकट आगे बढ़ रहा था। साफ दिखने लगा था कि मंदी गहरा रही है। उस दौरान सोचने समझनेवालों के लिए यही हॉट टॉपिक रहा होगा कि अब आगे क्या...
1936 में डोरोथिया द्वारा फ्लोरेंस थॉम्पसन का
 खींचा गया मशहूर फोटो, इसे ग्रेट डिप्रेशन का सबसे
ताकतवर प्रतीकात्मक फोटो माना जाता है
और फिर 1934 आ गया। सिटी लाइट्स की कामयाबी ने चैप्लिन को देवता बना दिया था। पैसे और तारीफ ने उन्हें ऐसा बौराया कि वो रात-दिन बस कुछ भी करते लेकिन ना फिल्म करते और ना फिल्म के बारे में बात। एक दिन किसी युवा आलोचक की टिप्पणी ने चैप्लिन को निराश कर दिया। उसने लिखा था कि सिटी लाइट्स बहुत अच्छी फिल्म है लेकिन इसे संवेदनाओं की सीमा रेखा पर बनाया गया है और भविष्य में चैप्लिन को और यथार्थवादी फिल्में बनानी चाहिए। चैप्लिन उससे सहमत थे।
इसी तरह चैप्लिन एक बार किसी युवा पत्रकार से मिले। उसने उन्हें मिशिगन शहर के डेट्रायट के बारे में बताया। वहां किस तरह मज़दूरों से बुरी तरह काम लिया जाता है ये जानने के बाद चैप्लिन का दिमाग घूम गया। आगामी फिल्म मॉडर्न टाइम्स की भूमिका बन चुकी थी। हालात चैप्लिन को मशीन और इंसान की कहानी मॉडर्न टाइम्स बनाने के लिए मजबूर कर रहे थे। मिशिगन में मज़दूरी ऐसे कराई जाती थी कि मज़दूर पागल तक हो जाते थे। बस चैप्लिन ने अपनी फिल्म के मुख्य किरदार ट्रैम्प को भी वैसा ही दिखाना तय कर लिया। गरीब ट्रैम्प को फिल्म में अपनी हिरोइन के साथ मंदी, हड़ताल और बेरोजगारी झेलनी थी। खूबसूरत अभिनेत्री पॉलेट को गरीब नायक की प्रेमिका दिखाने के लिए मुंह पर राख मलनी पड़ी। वो बेचारी रो ही पड़ी, मगर चैप्लिन ने तय किया था कि इस बार गरीबी को इस तरह दिखाना है कि वो सच्ची जान पड़े।
फिल्म मॉडर्न टाइम्स, 1936
दुनिया में उस वक्त पूंजीवाद और साम्यवाद की बहस चल रही थी। कई अखबारों ने छाप दिया कि चैप्लिन की नई फिल्म वामपंथ का समर्थन करती है। चैप्लिन ने ना तो फिल्म को समर्थक कहा और ना ही विरोधी। फिल्म रिलीज़ हुई और पहले हफ्ते दर्शकों ने रिकॉर्ड बना डाला। दूसरा हफ्ता भीड़ थोड़ी कम हुई। घबराए हुए चैप्लिन ने न्यूयॉर्क और लॉस एंजेल्स से दूर होनोलुलू जाने का फैसला कर लिया। ये फैसला चैप्लिन ने बहुत जल्दबाज़ी में लिया और जैसे ही वो समुद्री जहाज से होनोलुलू में उतरे तो हैरत में पड़ गए। बड़े-बड़े होर्डिंग्स और प्रेस उनका वहीं इंतज़ार कर रही थी। कोई जगह नहीं थी जहां मशहूर चैप्लिन जा छिपते। खैर, चैप्लिन दौड़ते -भागते रहे और मॉडर्न टाइम्स कामयाब हो गई। इस फिल्म का एक सीन बेहद यादगार हैै और मैं उसे ब्लॉग में लगा भी रहा हूं। कॉमेडी में ट्रेजेडी का ये नायाब उदाहरण है। इस सीन में चैप्लिन खड़े होकर नट बोल्ट कस रहे हैं। उनके सामने एक बेल्ट चल रही है। बेल्ट की अपनी रफ्तार है और मज़दूर को उसी रफ्तार से काम करना है। किरदार ऐसा करने की कोशिश में मशीन के मुंह में चला जाता है और बड़ी मुश्किल से बाहर आ पाता है। वो बाहर आ तो जाता है लेकिन पागल हो जाता है।
फ्रांस के मशहूर दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र और सिमोन डी बुवा ने आगे चलकर अपने जर्नल का नाम भी उसी फिल्म के नाम पर रखा। अमेरिका में वो दौर भुखमरी और हड़ताल का था। फिल्म कमाई के मामले में सिवाय अमेरिका के हर जगह कामयाब थी। उस फिल्म से पहले भी कई फिल्मों ने मशीनों को इंसान का दुश्मन बताने की कोशिश की थी, लेकिन चैप्लिन की अपील अलग ही थी। लोग जो महसूस कर रहे थे वही स्क्रीन पर देख रहे थे। हालांकि मशीनों के खिलाफ बात करने को वामपंथ ठहरा दिए जाने का खतरा था। तब तक ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी में तो वामपंथियों को देशद्रोही से लेकर ना जाने क्या क्या कहा जाने लगा था। इस बात को समझने के लिए आपको एक अमेरिकी फिल्म लेखक डाल्टन ट्रंबो के बारे में पढ़ना चाहिए। उन पर फिल्म भी बन चुकी है। कैसे उन्हें वामपंथी होने की सज़ा पूरी बेहरमी से दी गई थी जबकि ना वो किसी कत्ल में शामिल थे और ना किसी साज़िश में। इसके आगे बताऊंगा कि कैसे चैप्लिन पर भी वामपंथी होने का शक किया गया। सबको हंसाने वाला वो हीरो किस तरह सबको डरानेवाले हिटलर के सामने ताल ठोक कर खड़ा हो गया। वो किसी तरफ नहीं था, सिर्फ अपनी तरफ था पर सबकी किस्मत में वो वक्त देखना लिखा होता है जब वो अकेला पड़ जाता है। चैप्लिन अपवाद कैसे हो सकते थे भला....
क्रमश:
फिल्म मॉडर्न टाइम्स का भुला ना सकने वाला एक दृश्य



गुरुवार, 15 जून 2017

गांधी, चार्ली, चर्चिल और मशीन -2

चार्ली चैप्लिन महात्मा गांधी से मिलना चाहते थे जिसके लिए कैनिंग टाउन में डॉक्टर चुन्नीलाल कतियाल के यहाँ 22 सितम्बर 1931 की शाम का वक्त तय हुआ। खुद चैप्लिन ने इस रोचक मुलाकात को आत्मकथा में सहेजा है। उस वक्त का एक फोटो रिकॉर्ड्स में मिलता है जिसमें गांधी गाड़ी से बाहर आ रहे हैं और उन्हें लोगों ने चारों तरफ से घेर रखा है। जिस घर में उनकी चैप्लिन से मुलाकात तय थी वहीं से चैप्लिन उन्हें देख रहे थे। फोटो भी वहीं से खींचा गया है। गांधी को देखकर लगे नारों का ज़िक्र तो चैप्लिन की आत्मकथा में मिलता ही है, साथ में वो बताते हैं कि कैसे गांधी का पहनावा लंदन के हिसाब से एकदम बेतरतीब था। ज़ाहिर है बाहर ठंड थी और वो भी गीली.. लेकिन गांधी अपनी धोती लपेटे ही हर जगह सहजता से घूम रहे थे। वो जहां ठहरे थे वो भी कोई होटल नहीं था बल्कि एक स्लम था। नीचे फर्श पर ही उनका बिस्तर लगता था। चैप्लिन इस हिंदुस्तानी सादगी को गले से नीचे उतार ही नहीं पा रहे थे। गांधी से बातचीत के पहले चैप्लिन से एक युवती लगातार बात करती जा रही थी। बेचारे चैप्लिन को बहुत कुछ समझ नहीं आ रहा था लेकिन हां-हां करने की उनकी अपनी मजबूरी थी। तभी उस युवती को किसी महिला ने डांट लगाकर चुप कराया। ये शायद सरोजिनी नायडु थीं। आगे की मुलाकात का ब्यौरा चैप्लिन के ही शब्दों में पढ़िए। अनुवाद सूरज प्रकाश का है-
चैप्लिन से मुलाकात के पहले भीड़ के घेरे में गांधी, 1931


 मैंने गांधी की राजनैतिक साफगोई और इस्पात जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति के लिए हमेशा उनका सम्मान किया है और उनकी प्रशंसा की है। लेकिन मुझे ऐसा लगा कि उनका लंदन आना एक भूल थी। उनकी मिथकीय महत्ता, लंदन के परिदृश्य में हवा में ही उड़ गयी है और उनका धार्मिक प्रदर्शन भाव अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहा है। इंगलैंड के ठंडे भीगे मौसम में अपनी परम्परागत धोती, जिसे वे अपने बदन पर बेतरतीबी से लपेटे रहते हैं, में वे बेमेल लगते हैं। लंदन में उनकी इस तरह की मौजूदगी से कार्टून और कैरीकेचर बनाने वालों को मसाला ही मिला है। दूर के ढोल ही सुहावने लगते हैं। किसी भी व्यक्ति के प्रभाव का असर दूर से ही होता है। मुझसे पूछा गया था कि क्या मैं उनसे मिलना चाहूंगा। बेशक, मैं इस प्रस्ताव से ही रोमांचित था।



चार्ली चैप्लिन-गांधी की अविस्मरणीय मुलाकात, 22 सितंबर 1931
मैं उनसे ईस्ट इंडिया डॉक रोड के पास ही झोपड़ पट्टी जिले के छोटे से अति साधारण घर में मिला। गलियों में भीड़ भरी हुई थी और मकान की दोनों मंज़िलों पर प्रेस वाले और फोटोग्राफर ठुंसे पड़े थे। साक्षात्कार पहली मंज़िल पर लगभग बारह गुणा बारह फुट के सामने वाले कमरे में हुआ। महात्मा तब तक आये नहीं थे; और जिस वक्त मैं उनका इंतज़ार कर रहा था, मैं ये सोचने लगा कि मैं उनसे क्या बात करूंगा। मैंने उनके जेल जाने और भूख हड़तालों और भारत की आज़ादी के लिए उनकी लड़ाई के बारे में सुना था और मैं इस बारे में थोड़ा बहुत जानता था कि वे मशीनों के इस्तेमाल के विरोधी हैं।
आखिरकार जिस वक्त गांधी आये, टैक्सी से उनके उतरते ही चारों तरफ हल्ला गुल्ला मच गया। उनकी जय जय कार होने लगी। गांधी अपनी धोती को बदन पर लपेट रहे थे। उस तंग भीड़ भरी झोपड़ पट्टी की गली में ये अजीब नज़ारा था। एक दुबली पतली काया एक जीर्ण शीर्ण से घर में प्रवेश कर रही थी और उनके चारों तरफ जय जयकार के नारे लग रहे थे। वे ऊपर आये और फिर खिड़की में अपना चेहरा दिखाया। तब उन्होंने मेरी तरफ इशारा किया और तब हम दोनों ने मिल कर नीचे जुट आयी भीड़ की तरफ हाथ हिलाये।जैसे ही हम सोफे पर बैठे, चारों तरफ से अचानक ही कैमरों की फ्लैश लाइटों का हमला हो गया। मैं महात्मा की दायीं तरफ बैठा था। अब वह असहज करने वाला और डराने वाला पल आ ही पहुंचा था जब मुझे एक ऐसे विषय पर घाघ की तरह बौद्धिक तरीके से कुछ कहना था जिसके बारे में मैं बहुत कम जानता था। मेरी दायीं तरफ एक हठी युवती बैठी हुई थी जो मुझे एक अंतहीन कहानी सुना रही थी और उसका एक शब्द भी मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा था। मैं सिर्फ हां हां करते हुए सिर हिला रहा था और लगातार इस बात पर हैरान हो रहा था कि मैं उनसे कहूंगा क्या। मुझे पता था कि बात मुझे ही शुरू करनी है और ये बात तो तय ही थी कि महात्मा तो मुझे नहीं ही बताते कि उन्हें मेरी पिछली फिल्म कितनी अच्छी लगी थी और इस तरह की दूसरी बातें। और मुझे इस बात पर भी शक था कि उन्होंने कभी कोई फिल्म देखी भी होगी या नहीं। अलबत्ता, एक भारतीय महिला की आदेश देती सी आवाज़ गूंजी और उसने उस युवती की बक बक पर रोक लगा दी: "मिस, क्या आप बातचीत बंद करेंगी और मिस्टर चैप्लिन को गांधी जी से बात करने देंगी?"
भरा हुआ कमरा एक दम शांत हो गया। और जैसे ही महात्मा के चेहरे पर मेरी बात का इंतज़ार करने वाले भाव आये, मुझे लगा कि पूरा भारत मेरे शब्दों का इंतज़ार कर रहा है। इसलिए मैंने अपना गला खंखारा। "स्वाभाविक रूप से मैं आज़ादी के लिए भारत की आकांक्षाओं और संघर्ष का हिमायती हूं," मैंने कहा,"इसके बावज़ूद, मशीनरी के इस्तेमाल को ले कर आपके विरोध से मैं थोड़ा भ्रम में पड़ गया हूं।" मैं जैसे जैसे अपनी बात कहता गया, महात्मा सिर हिलाते रहे और मुस्कुराते रहे। "कुछ भी हो, मशीनरी अगर नि:स्वार्थ भाव से इस्तेमाल में लायी जाती है तो इससे इन्सान को गुलामी के बंधन से मुक्त करने में मदद मिलनी चाहिये और इससे उसे कम घंटों तक काम करना पड़ेगा और वह अपना मस्तिष्क विकसित करने और ज़िंदगी का आनंद उठाने के लिए ज्यादा समय बचा पायेगा।"
"मैं समझता हूं," वे शांत स्वर में अपनी बात कहते हुए बोले, "लेकिन इससे पहले कि भारत इन लक्ष्यों को प्राप्त कर सके, भारत को अपने आपको अंग्रेजी शासन से मुक्त कराना है। इससे पहले मशीनरी ने हमें इंगलैंड पर निर्भर बना दिया था, और उस निर्भरता से अपने आपको मुक्त कराने का हमारे पास एक ही तरीका है कि हम मशीनरी द्वारा बनाये गये सभी सामानों का बहिष्कार करें। यही कारण है कि हमने प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य बना दिया है कि वह अपना स्वयं का सूत काते और अपने स्वयं के लिए कपड़ा बुने। ये इंगलैंड जैसे अत्यंत शक्तिशाली राष्ट्र से लड़ने का हमारा अपना तरीका है और हां, और भी कारण हैं। भारत का मौसम इंग्लैंड के मौसम से अलग होता है और भारत की आदतें और ज़रूरतें अलग हैं। इंगलैंड के सर्दी के मौसम के कारण ये ज़रूरी हो जाता है कि आपके पास तेज उद्योग हो और इसमें अर्थव्यवस्था शामिल है। आपको खाना खाने के बर्तनों के लिए उद्योग की ज़रूरत होती है। हम अपनी उंगलियों से ही खाना खा लेते हैं। और इस तरह से देखें तो कई किस्म के फर्क सामने आते हैं।"
गांधी की लोकप्रियता दिखाता एक कार्टून, 1931 का हिंंदुस्तान टाइम्स
मुझे भारत की आज़ादी के लिए सामरिक जोड़ तोड़ में लचीलेपन का वस्तुपरक पाठ मिल गया था और विरोधाभास की बात ये थी कि इसके लिए प्रेरणा एक यथार्थवादी, एक ऐसे युग दृष्टा से मिल रही थी जिसमें इस काम को पूरा करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति थी। उन्होंने मुझे ये भी बताया कि सर्वोच्च स्वंतत्रता वह होती है कि आप अपने आपको अनावश्यक वस्तुओं से मुक्त कर डालें और कि हिंसा अंतत: स्वयं को ही नष्ट कर देती है।
जब कमरा खाली हो गया तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं वहीं रह कर उन्हें प्रार्थना करते हुए देखना चाहूंगा। महात्मा फर्श पर चौकड़ी मार कर बैठ गये और उनके आस पास घेरा बना कर पांच अन्य लोग बैठ गये। ये एक देखने योग्य दृष्य था। लंदन के झोपड़ पट्टी वाले इलाके के बीचों बीच एक छोटे से कमरे के फर्श पर छ: मूर्तियां पद्मासन में बैठी हुईं। लाल सूर्य छतों के पीछे से तेजी से अस्त हो रहा था और मैं खुद सोफे पर बैठा उन्हें नीचे देख रहा था। वे विनम्रता पूर्वक अपनी प्रार्थनाएं कर रहे थे। क्या विरोधाभास है, मैंने सोचा, मैं इस अत्यंत यथार्थवादी व्यक्ति को, तेज कानूनी दिमाग और राजनैतिक वास्तविकता का गहरा बोध रखने वाले इस शख्स को देख रहा था। ये सब आरोह अवरोह रहित बातचीत में विलीन हो रहा प्रतीत हो रहा था। गांधी से अपनी मुलाकात के बारे में चैप्लिन इतना ही बताते हैं।

1931 की ये मुलाकात लोगों की नज़र में भले खत्म हो गई हो लेकिन विचारवान चार्ली ने इससे क्या सीखा वो 1936 में तब पता चला जब वो फिल्म मॉडर्न टाइम्स लेकर पेश हुए। चैप्लिन अपनी फिल्म में मशीनों और मशीनों के पाश में फंसी मनुष्यता की खिल्ली उड़ाते दिख रहे थे। चैप्लिन आत्मकथा में मानते हैं कि एक पत्रकार के साथ हुई उनकी बातचीत ने भी उन्हें मॉडर्न टाइम्स तक पहुंचने का रास्ता दिखाया। ये दूसरी बात है कि फिल्मों में अपने विषयों के चुनाव की वजह से लोग चैप्लिन के भीतर अब राजनीतिक रुझान ढूंढने लगे थे। पूंजीवाद के साथ कदम मिलाकर चल रहे अंधराष्ट्रवाद और साम्यवाद के बीच अपनी राह पर मस्त चलते चार्ली चैप्लिन को अमेरिका और इंग्लैंड की खुफिया एजेंसियों के राडार पर आना अभी बाकी थी।
क्रमश:
















बुधवार, 14 जून 2017

गांधी, चार्ली, चर्चिल और मशीन -1

साल 1936 में जर्मनी ओलंपिक खेलों का मेजबान था। एडोल्फ हिटलर के लिए ये मौका था जब वो दिखा सकता था कि अट्ठारह साल पूर्व पहली आलमी लड़ाई में हार चुका जर्मनी फिर से उठ खड़ा हुआ है। इन खेलों के सहारे वो जर्मनों की शर्मिंदगी को आत्मविश्वास में तब्दील कर डालना चाहता था। उसने टीवी नाम की मशीन का इस्तेमाल किया और पहली बार दुनिया में किसी खेल आयोजन का प्रसारण हुआ। वाकई वो जर्मनी की भव्यता का अद्भुत प्रदर्शन था। इसे समझने के लिए आप चाहें तो हॉलीवुड की मशहूर फिल्म रेस देख सकते हैं। फिल्म एक ऐसे अश्वेत एथलीट पर है जिसका जीतना हिटलर को भाता नहीं लेकिन वो नाज़ी जर्मनी के बड़े खिलाड़ियों को हराकर हिटलर का मान मर्दन करता है। ये वही ओलंपिक था जिसमें ध्यानचंद ने हॉकी स्टिक घुुमाकर हिटलर को सम्मोहित कर डाला था। ऑस्ट्रिया के वियना शहर में साल 1939 को ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए मूर्ति इसके ही बाद लगी । ठीक इसी दौरान दुनिया में विज्ञान कुलांचे भर रहा था। मशीनें और भी तेज़ हो रही थीं.. ज़्यादा स्मार्ट बन रही थीं। हर देश उत्पादन बढ़ाने के लिए मॉडर्न मशीनें चाहता था। पैसा कमाने की दौड़ में कोई किसी से पीछे नहीं छूटना चाह रहा था। तेज़ दौड़ती कारें.. दोगुनी-तिगुनी रफ्तार से सामान पैदा करते कारखाने.. सब कुछ तेज़ और ज़्यादा के बीच झूल रहा था।
1936 के ओलंपिक में जादू करते ध्यानचंद
पश्चिम से हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे गांधी इस दृश्य को देखकर सहमे हुए थे। जो डर वो सालों पहले हिंद स्वराज में व्यक्त कर चुके थे, अब वो हकीकत बनकर सामने खड़ा था। हिंद स्वराज में गांधी ने लिखा था- 'मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्‍यता की मुख्‍य निशानी है और वह महापाप है, ऐसा मैं तो साफ देख सकता हूँ।' जो वो देख समझ रहे थे उसे ठीक इसी दौरान फिल्मों का सबसे चमकता सितारा चार्ली चैप्लिन भी महसूस करने लगा था। हालांकि वो खुद नई मशीनों के सहारे अपने धंधे का विस्तार कर रहे थे मगर वो भूले नहीं थे कि उनका कल गरीबी की गोद में खेलकर ही दमकने वाला आज बना था। मशीनों के फेर में बढ़ती बेरोज़गारी और साथ ही खिंचते जा रहे काम के घंटे उन्हें परेशान करने लगे थे। टॉल्स्टॉय, इमरसन, रस्किन जैसे चिंतक मशीनों के चंगुल से आज़ाद करके मानवता को प्रकृति की तरफ ले जाना चाहते थे। वो अजब से धर्मसंकट में थे।
दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में गांधीजी, सितंबर,1931
अब मैं ले चलता हूं आपको साल 1931 में। जगह लंदन थी और मौका था दूसरे गोलमेज सम्मेलन का। महात्मा गांधी पहले गोलमेज़ सम्मेलन के नाकामयाब होने के बाद कांग्रेस की तरफ से प्रतिनिधि बनकर आए थे। दक्षिण अफ्रीका से हिंदुस्तान लौटने के बाद वो पहली बार विदेशी दौरे पर थे। वक्त बदल चुका था। दुनिया या तो उनसे प्यार कर रही थी या नफरत.. लेकिन नज़रअंदाज़ अब कोई नहीं कर सकता था। असहयोग आंदोलन के प्रयोग ने अंग्रेज़ों के साथ ही पूरी दुनिया को समझा दिया था कि गांधी नाम का प्रयोगवादी बिना हिंसा किए भी जो हासिल करना चाहता है वो धीरे-धीरे कर रहा है। उस वक्त के वायसराय विलिंगडन तो गांधी के सामने बेहद बेबस थे। उन्होंने अपनी बहन को एक खत लिखा था। उसमें गांधी के बारे में उनकी जो राय थी वो पढ़िए- ''अगर गाँधी न होता तो यह दुनिया वाकई बहुत खूबसूरत होती। वह जो भी कदम उठाता है उसे ईश्वर की प्रेरणा का परिणाम कहता है लेकिन असल में उसके पीछे एक गहरी राजनीतिक चाल होती है। देखता हूँ कि अमेरिकी प्रेस उसको गज़ब का आदमी बताती है लेकिन सच यह है कि हम निहायत अव्यावहारिक , रहस्यवादी और अंधिविश्वासी जनता के बीच रह रहे हैं जो गाँधी को भगवान मान बैठी है।'' भारत की जनता के तत्कालीन भगवान से मिलने के लिए चार्ली चैप्लिन भी उत्साहित थे। वो खुद अपनी फिल्म सिटी लाइट्स का प्रचार करने बचपन के शहर लंदन लौटे थे। उन्हें सुझाव मिला कि गांधी से मिलिए। मौका अच्छा था।
विंस्टन चर्चिल के साथ चार्ली चैप्लिन अक्सर गुफ्तगू करते थे
उससे ठीक कुछ रात पहले चैप्लिन उन विंस्टन चर्चिल और उनके सहयोगियों से डिनर पर मिले थे जिन्हें गांधी फूटी आंख पसंद नहीं था। अधनंगा फकीर कहकर चर्चिल ने ही गांधी का अपमान करने की कोशिश की थी। चैप्लिन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि- मैंने उन्हें बताया कि मैं गांधी जी से मिलने जा रहा हूं जो इन दिनों लंदन में हैं। "हमने इस व्यक्ति को बहुत झेल लिया है। ब्रैकेन ने कहा,"भूख हड़ताल हो या न हो, उन्हें चाहिये कि वे इन्हें जेल में ही रखें। नहीं तो ये बात पक्की है कि हम भारत को खो बैठेंगे।"
"गांधी को जेल में डालना सबसे आसान हल होगा, अगर ये हर काम करे तो " मैंने टोका, "लेकिन अगर आप एक गांधी को जेल में डालते हैं तो दूसरा गांधी उठ खड़ा होगा और जब तक उन्हें वह मिल नहीं जाता जो वे चाहते हैं वे एक गांधी के बाद दूसरा गांधी पैदा करते रहेंगे।" चर्चिल मेरी तरफ मुड़े और मुस्कुराये,"आप तो अच्छे खासे लेबर सदस्य बन सकते हैं।" ये चर्चिल का तंज था। चर्चिल का ज़िक्र चला है तो लिखता चलूं कि वो भारत पर राज करना इतना ज़रूरी समझते थे कि अप्रैल 1931 में कहा था - The loss of India will be the death blow of the British Empire। गलत नहीं थे चर्चिल। बहरहाल, इस मुलाकात के बाद चार्ली चैप्लिन को गांधी से मिलना था।


क्रमश:


रविवार, 5 मार्च 2017

साढ़े तीन इश्क की किश्त..

वो कॉफी बनाने के लिए किचन की तरफ चला गया तो सारिका भी बैठी नहीं रह सकी। ड्राइंगरूम में ही टहलने लगी। दीवार पर एक पेंटिंग सजी थी जिसके कोने में पेंटर का फ्रेंच नाम टंका था। कुछ याद नहीं आया कि साहिल को पेंटिंग का शौक कब रहा। अब सारिका का ध्यान साइड टेबल के ऊपर रखी गज़लों के बेतरतीब रिकॉर्ड्स पर था। उसे फिर से ख्याल आया कि साहिल तो गाने-बजाने के नाम पर सिर्फ लाउड पंजाबी गाने ही सुनता था तो ये गज़ल तक कब आ पहुंचा। एक बार तो कार में कौन सा गाना चलेगा इसी बात पर ऐसी लड़ाई हुई कि सारिका ने बीच सड़क में ही कार से उतरकर घर के लिए टैक्सी ले ली थी। क्या कमाल के दिन थे वो। छोटी सी बात पर प्यार,, और छोटी सी ही बात पर तकरार। लंबी सांस लेकर सारिका ने पलटकर ड्राइंगरूम से लगी बॉलकनी की तरफ कदम बढ़ाए। हवा में झूमती प्यारी-सी लिली जैसे मुस्कुराकर उसे ही देख रही थी। अरे.. ऐसी ही लिली तो थी सारिका के हॉस्टल के कमरे के बाहर भी जो अठखेलियां करती थीं। लिली ज़रा सी मुरझाती तो सारिका का मुंह कॉलेज में पूरा-पूरा दिन लटका रहता। साहिल उसे चिढ़ाता भी था- 'अरे.. आज लिली मुरझाई क्यों है....' साहिल को कभी फूलों का शौक नहीं था। कभी बहुत लड़ाई के बाद भी अगर सारिका को मनाने के लिए लाता तो कुछ भी ले आता। जब साथ थे तो कभी समझ ही नहीं सका कि उसे सिर्फ लिली पसंद है। आहट से सारिका चौंक गई। साहिल हाथ में कॉफी का मग लिए खड़ा था। हंसकर बोला- 'तो यहां भी लिली ढूंढ ली तुमने!!' सारिका के चेहरे पर हंसी नहीं थी। आंखों में आंसू थे। ज़बान पर सवाल- 'साहिल जब इतना ही बदलना था तो वक्त रहते क्यों नहीं बदले तुम....' साहिल को जैसे इस सवाल का दस सालों से इंतज़ार था। आंखों में आंखें डालकर कहा- 'सारिका, मैं बदल रहा था धीरे-धीरे.. तुम्हारे पास लेकिन महसूस करने का वक्त नहीं था।' सारिका का मोबाइल बजने लगा। कोई पंजाबी गाना था.. वैसा ही जैसा साहिल को दस साल पहले पसंद था। झट से फोन काटकर उसने पर्स उठा लिया- 'सॉरी साहिल, उनका फोन है। मैं चलती हूं। फिर कभी मिलते हैं। अब तो हम इसी शहर में आ गए हैं।'
'वो तो ठीक है सारिका, लेकिन जैसे सालों बाद आज अचानक मिली हो वैसे ही अब अचानक गायब मत हो जाना'' फिर से साहिल ने उसे अपनी आदत के मुताबिक छेड़ा लेकिन सारिका वाकई जल्दी में थी। सामान उठाकर दरवाज़े की तरफ चल दी.. बस इतना ही बोली- 'देखते हैं साहिल...'

(साढ़े तीन इश्क की किश्त-1)