सोमवार, 8 जनवरी 2018

अंबेडकर से हिंदी पट्टी के सवर्ण बच्चे का पहला परिचय (भाग-2)

तो मैं बता रहा था कि कैसे डॉ भीमराव अंबेडकर से मेरा पहला परिचय हुआ। उनकी हाथ-टूटी मूर्तियों ने मेरे मन में उनके प्रति आकर्षण जगाया था। गोल-मटोल, कोट-पैंट पहने और हाथ में किताब लिए खड़े अंबेडकर की मूर्तियां हर गांव में थीं तो सही मगर सभी खंडित। एकाध कोई होगी जो साबुत थी। मैंने अपने आसपास के लोगों से जब भी सवाल किए तो मुझे अंबेडकर और दलितों को लेकर एक नफरत का सा भाव महसूस हुआ। दलितों से तो नफरत फिर भी समझ आती थी (जितनी एक बच्चे को आ सकती थी)। वो गंदे-संदे रहते हैं लेकिन देखने में ही साफ-सुथरे अंबेडकर से दिक्कत कैसी? मुझे याद है कि मैं दसवीं में था और अपने गांव के स्कूल में पढ़ रहा था।गरमी की एक दोपहर मैं बरामदे में खेल रहा था। एक औरत मेरी बुआ के साथ कुरसी पर बैठी बातें कर रही थी। जैसे ही वो गई, मेरी बुआ ने प्लास्टिक की उस कुरसी पर एक बालटी पानी फेंक दिया। पानी की तेज़ आवाज़ सुनकर मैं चौंक गया। कुरसी पर पानी फेंकने की हरकत को देख तो और हैरान था। मैंने वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि वो @#$ थी। मेरा दिमाग भन्ना गया। बहसबाज़ पूरा था और डरना तो बहुत पहले छोड़ चुका था, पलट कर पूछा- वो चाहे जो थी, उसके कपड़ों में गोबर लगा था क्या ???? क्यों फेंका पानी कुरसी पर?
बेचारी मेरी बुआ तर्क-फर्क से दूर थी। उन्होंने जो सीखा था वही किया। सोलह साल के भतीजे से ऐसा सवाल सुना तो क्या जवाब देती। वो चली गईं लेकिन मैं बहुत देर तक बरामदे में घूम घूम कर बोलता रहा। उस उम्र तक मैं जाति का जन्मना गौरव खोने लगा था। हां, मुखर भले नहीं था और अपने नाम के आगे और पीछे जातिगत उपनाम भी लगाता था लेकिन दलितों से मेरी कोई चिढ़ नहीं थी। क्रिकेट टीम चुनने के वक्त मेरी पहली पसंद हरिजन लड़के रहते थे। कमाल का खेलते थे। फील्डिंग के दौरान उन्हें गिरकर बॉल रोकने में समस्या नहीं होती थी। सोफिस्टिकेटेड सवर्ण भाई जेब में हाथ डाल बॉल को जाते देखते रहते थे, क्योंकि वो कपड़े गंदे नहीं करना चाहते थे। उस दौरान गांव के अकेले मुस्लिम परिवार का लड़का मेरा सबसे अच्छा दोस्त था। मैं घर पर नहीं था और ईद पर वो मेरे लिए मिठाई देकर गया था। घर लौटने पर मुझे मिठाई नहीं मिली क्योंकि एक मुसलमान के घर से मिठाई आने पर पहले ही इधर-उधर ठिकाने लगा दी गई थी। मैं घर भर में जमकर बरसा था। वो फिर अलग ही किस्सा है कि उस मिठाई की कमी मैंने उसके घर पर खा-पीकर पूरी की थी। उस वक्त मैं नहीं जानता था कि अपनी 'महानता' (जैसा कुछ लोग अब तक समझने लगे होंगे कि मैं अपनी महानता का गौरवगान कर रहा हूं) के किस्से सुनाने का कभी मौका मिलेगा। खैर, अभी भी मैं अंबेडकर को ठीक से एक्स्प्लोर नहीं कर पा रहा था।
आगे मुझे ये भी बताया गया कि अंबेडकर ने तो संविधान लिखा ही नहीं, वो तो इधर-उधर से दूसरों का माल इकट्ठा करके एक किताब में डाल भर दिया। भला ऐसा कोई संविधान होता है! अब जवाब तो मुझे नहीं मालूम था कि संविधान कैसा होता है मगर मेरे आसपास सब यही कहे जा रहे थे कि भला ऐसा कोई संविधान होता है! कई सालों तक मैं भी बिना दिमाग लगाए अंतर्मन में यही दोहराता रहा और आगे जाकर अपने से छोटों को भी बाकायदा तर्क देकर समझाने लगा कि संविधान तो उधार का पोटला है। ये बात ज़ाहिर है कि मैंने तब तक संविधान पढ़ा नहीं था, पढ़ लेता तो भी समझना मुश्किल था। ये समझना तो और भी मुश्किल था कि इसकी गहराई क्या है और ये कैसे हालात में किनके हितों की रक्षा के लिए लिखा गया था। बहरहाल, मैं छोटा था। औकात भर का सोच रहा था। आगे चलकर आरएसएस के आनुषांगिक संगठनों से संपर्क हुआ। वहां अंबेडकर की फोटो तो थी, लेकिन संविधान को लेकर ऐसा कोई खास सम्मान नहीं था। कभी-कभी तो सुनता भी था कि संविधान में हिंदुओं के लिए कुछ नहीं है। (जब पढ़ा तो पाया कि बात सही थी, सब भारत के नागरिकों के लिए था)। अभी तक भी मेरी समझ यही थी कि गांधी ने दलितों को खुश रखने के लिए अंबेडकर का प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया था। सबको साथ रखने का ये गांधियन तरीका था जो बाद में राजनैतिक दलों ने पूरी चालाकी से इस्तेमाल किया। अंबेडकर सिर्फ रबर स्टांप थे। खैर, संविधान सभा की बहस को टुकड़ों में पढ़कर या संविधान पर बनी डॉक्यूमेंट्री और किताबें देखकर पता चलता है कि अंबेडकर को रबर स्टांप बनाकर इस्तेमाल कर पाना किसी के लिए भी बूते से बाहर था। सही मायनों में अंबेडकर के लिए दलित प्रश्न से बड़ा ना कोई पद था और ना देश की आज़ादी ही थी। उनके सामने साफ था कि देश आज़ाद भी हो जाए तो भी दलितों के हालात बदलने मुश्किल हैं। महिला अधिकारों को लेकर उनकी ज़िद संविधान में साफ परिलक्षित होती है। तो मैं बता रहा था कि हिंदू संगठनों में भी अंबेडकर की फोटो के लिए जगह तो थी मगर दलितों के लिए नहीं। संविधान को लेकर भी सम्मान जैसी बात नहीं थी। दलित आबादी को साथ रखने के लिए अंबेडकर जयंती या वाल्मीकि जयंती मनाना पिछले दशक भर के चोचले हैं। वहां तिरंगे तक पर बहस होती है। बहस भले ही चिंतनशील समाज का लक्षण है लेकिन यहां उनके तब दिए जानेवाले तर्क लिख दूं तो बेवजह शर्मसार होंगे। फिर मैंने अंबेडकर की जीवनी पढ़ी। सोचा कि देख तो लूं आदमी भगवान कैसे बनता है। पढ़ा तो बहुत कुछ पाया। उनका संघर्ष तो जाना ही लेकिन उनके शिक्षक, महाराजा गायकवाड़ और गांधी जैसे सवर्णों को भी उस संघर्ष में योगदान देते पाया। (आज के अंबेडकराइट्स को इस लाइन से दर्द होगा, लेकिन मैं किसी की परवाह नहीं कर रहा तो उनकी भी क्यों हो)। किताबें पढ़कर मुझे हौसला मिला कि मैं अब जो अंबेडकर के बारे में जानता हूं तो गलत नहीं जानता हूं। एक बात जो मेरे मन में बहुत ज़्यादा घर कर गई थी वो ये कि विदेश से डिग्री लेकर लौटे अंबेडकर जब महाराजा गायकवाड के यहां नौकरी पर लगे तो उन्हें चपरासी तक फाइल दूर से फेंककर देता था। इतना ज़्यादा अपमान !! ऐसा और भी जाने क्या क्या सहने के बावजूद अंबेडकर ने बंदूक नहीं उठाई, कलम उठाई। बंदूक उठा लेते तो शायद कुछ साल बाद मारे जाते लेकिन कलम उठाने का विज़न ऐसा था कि उनको मारने की साज़िशें मर गईं.. और आज इतने सालों बाद उनके दुश्मन भी उन्हें मंजूर करने को मजबूर हैं.. वजह चाहे जो हों। मैं हर बात में अंबेडकर से सहमत नहीं हूं, उनसे क्या किसी से भी नहीं हूं लेकिन उनके बारे में काफी कुछ पढ़ने के बाद उन्हें भगवान नहीं मानता। भगवान नहीं मानता इसलिए असहमत होकर भी सम्मान में झुका हूं। उनका संघर्ष उनसे भी बड़ा है।

अंबेडकर से हिंदी पट्टी के सवर्ण बच्चे का पहला परिचय (भाग-1)

झूठ नहीं लिखूंगा.. भले ही सच लिखने में रिस्क हो। कभी कहीं पढ़ा था कि सच लिखने की सबसे अच्छी बात यही है कि उसे याद नहीं रखना पड़ता और याद्दाश्त मेरी बहुत कमज़ोर है। एक दौर ऐसा भी था कि मैं शरीर और दिमाग दोनों से ही बच्चा था (दिमाग से तो आज भी हूं)। खैर, उन दिनों गरमी की छुट्टियों में ननिहाल जाता था। वहां आम, क्रिकेट और ट्यूबवैल में नहाना मेरे लिए परम आकर्षण थे। हमारी अपनी ट्यूबवैल में नहाने के लिए गांव से बाहर निकलना पड़ता था। वहीं रास्ते में सड़क किनारे एकदम ही सुनसान में एक आदमी की छोटी सी खंडित मूर्ति खड़ी देखी थी। पहले पहल तो नहाने के उत्साह में उसे लेकर कोई फिक्र नहीं हुई मगर बालमन कब तक ना पूछता। आखिर एक दिन विचार आया कि रात को जब अंधेरा होता होगा तो इस मूर्ति को यहां अकेले में डर नहीं लगता होगा (हंसिए मत, बचपन में मैं मान कर चलता था कि हर चीज़ जो दिख रही है सबमें जान है.. वक्त के साथ ये भरोसा मज़बूत ही हो रहा है)!!! फिर एक दिन अपने ममेरे भाई से पूछा कि ये किसकी मूर्ति है और इसके टूटे हाथ को जुड़वाते क्यों नहीं हो? वो हंसने लगा। बोला- हरिजनों का भगवान है।
शब्द अब ठीक से याद नहीं लेकिन यही कहा होगा। मैं चौंका हूंगा और खुद से ही बोला भी होगा- गज़ब.......... कोट-पैंट वाला भगवान!!
फिर उसने ही धीमे से कहा- इसका हाथ तो पिताजी ने ही तोड़ा था। (हम नाना जी को पिता जी कहते थे) 
मैंने ज़्यादा कुछ नहीं पूछा लेकिन खुद ही मान लिया कि चूंकि हमारे घर और हरिजनों की बस्ती दूर है, और क्योंकि हम लोगों का आपस में लेनादेना सिर्फ इतना है कि वो हमारे गाय-भैंसों का गोबर उठाकर ले जाते हैं तो ज़रूर अपने बीच कोई कंपटीशन टाइप है। बताने की ज़रूरत नहीं कि वो मूर्ति अंबेडकर की थी और मेरा ममेरा भाई डींग हांक कर जताना चाह रहा था कि दलित बहुल गांव में भी दलितों का भगवान हमारे मरज़ी के बिना साबुत नहीं खड़ा हो सकता। इसके बाद मैंने कई और गांव में हाथ टूटे हुए अंबेडकर देखे। धीरे-धीरे मेरे लिए नज़रअंदाज़ करना ज़रा मुश्किल होने लगा । एक सूटेड बूटेड आदमी हाथ में किताब लिए खड़ा है और लगभग हर गांव में उसका हाथ टूटा हुआ है.. आखिर माज़रा क्या है ? जिनका भगवान है वो हाथ क्यों नहीं जुड़वा रहे.... जब किसी से पूछा तो उसने कहा कि दिन में हाथ जुड़ता है तो अगली सुबह टूटा ही मिलता है.. कब तक जुड़वाएंगे...
समस्या वाकई गंभीर थी.. एक बच्चे के लिए तो और भी गंभीर। आखिर इस भगवान के हाथ में तो हथियार भी नहीं। गोल मटोल प्यारा सा दिखता है। कोट-पैंट-टाई के साथ किताब हाथ में लिए खड़ा है। खतरा जैसा तो कुछ महसूस होता नहीं फिर वो लोग जिनके घरों में सबसे ज़्यादा हथियार हैं इससे डरे हुए क्यों हैं। अब ठीक से याद नहीं लेकिन पापा से या किसी बड़े से पूछा था- ये किताब क्या है जो हाथ में लिए खड़े हैं ? 
जवाब मिला- संविधान।
मैंने पूछा- वो क्या है ?
बोले- देश उससे ही चल रहा है।। नियम हैं।
मैंने फिर पूछा- हां तो ये क्यों लिए खड़े हैं।
उन्होंने कहा- इन्होंने बनाया था।
मैं रुका नहीं- इन्होंने ही सारे नियम बनाए हैं ?
उन्होंने सोचा, गलती हो गई, बोले- हां, बहुत सारे लोग थे लेकिन लास्ट में इन्होंने ही लिखा था। बहुत पढ़े-लिखे थे ना।
अब तो समस्या और गंभीर हो चली थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि जो इन्हें अपना भगवान मानते हैं ना तो उनके पास इन जैसे कपड़े हैं और ना ही पढ़े-लिखे दिखते हैं। दूसरी तरफ ये हमारे भगवान नहीं लेकिन कोट-पैंट और किताब तो हमारे ही हिस्से में हैं.. आखिर ये पहेली क्या है ? भक्त भगवान जैसा नहीं.. और दुश्मन भगवान जैसे ही हैं!!
- किस्सा
जारी है...

बेनज़ीर का पहला भारत दौरा


हाल बेनज़ीर कट्टरपंथी पाकिस्तान में ताज़ी हवा का झोंका बनकर आई थी। यूं उनके होते हुए पाकिस्तान और भारत के संबंध बहुत खुशनुमा तो कतई नहीं रहे लेकिन फिर भी एक महिला को शासन करते देख एक मानवीय संतोष होता रहा। ये तस्वीर उस 19 साल की बेनज़ीर की है जो अपने पिता से सियासत का ककहरा सीख रही थी। वो अमेरिका से छुट्टी में पाकिस्तान लौटी थी और पिता के साथ शिमला घूमने चली आईं। उस वक्त बांग्लादेश के मामले पर करारी चोट खाकर भुट्टो किसी समझौते की राह तलाशने हिंदुस्तान बुलाए गए थे। उन्होंने शिमला में इंदिरा गांधी से मुलाकातें की। साल 1972 था और महीना जून का था। भारतीय मीडिया की नज़र में बेनज़ीर चढ़ गई। बेनज़ीर ने खुद अपनी किताब में लिखा है कि कैसे उनके पिता ने उन्हें नसीहत दी थी कि इस यात्रा के दौरान मुस्कुराना मत। भुट्टो नहीं चाहते थे कि हार से आहत पाकिस्तान अपने नेता की बेटी को हंसता मुस्कुराता देखकर ये सोचे कि बेनज़ीर को मुल्क की हार का गम नहीं। इसके उलट भुट्टो ये भी नहीं चाहते थे कि वो उदास दिखे क्योंकि इससे ये संदेश जाता कि पाकिस्तानी खेमे में मातम है। बेचारी बेनज़ीर ने पहला कूटनीतिक दबाव इस दौरे में ही झेला था। खुद बेनज़ीर भुट्टो ने बताया कि जब वो शिमला में हेलीपैड पर उतरीं तो उनके अस्सलाम वालेकुम का जवाब इंदिरा ने नमस्ते से दिया था।
बेनज़ीर को इस दौरे पर मीडिया की इतनी तवज्जो मिली थी कि खुद उनके पिता हैरान थे। मीडिया में उनके कपड़ों पर चर्चा चल रही थी। कमाल ये है कि वो ये सारे कपड़े अपनी दोस्त से उधार लेकर आई थी। वजह यही थी कि बेनज़ीर पश्चिमी परिधान पहनती थी लेकिन हिंदुस्तान के दौरे पर उन्हें परंपरागत पोशाक पहननी थीं। बेनज़ीर ने इस बात का भी खूब ज़िक्र किया है कि इस दौरे में इंदिरा उन्हें जिस ढंग से लगातार ऑब्ज़र्व करती थीं उससे वो बहुत नर्वस हो जाती थी।
(जानकारी बेनज़ीर की आत्मकथा और बीबीसी से)
(इति इतिहास श्रृंखला)


जैसी करनी, वैसी भरनी

तानाशाहों को भी लोकतंत्र अच्छा लगता है, बशर्ते वो उनके हक में हो। दुनिया के दो सबसे बड़े तानाशाह हिटलर और मुसोलिनी किसी राजशाही की पैदाइश नहीं थे। वो सभी समाज के गर्भ से निकले तत्कालीन नायक थे। जनता उनके साथ थी। उन्होंने उसी के दम से ताज़ गिराए, तख्त उछाले और फिर संसदों में घुसकर कभी हल्ले के साथ तो कभी चुपके से हर संस्था पर काबू पा लिया। अपने देश के लोगों की महत्वाकांक्षाओं को हवा देकर उन्होंने उसे आग की तरह खूब भड़काया। उस आग में हाथ तापे और फिर जब वक्त का पहिया घूमा... सम्मोहन टूटा... तो दोनों उसी आग में पतंगे की तरह जलकर भस्म हो गए। एक ने खुद को प्रेमिका के साथ गोली मार ली.. और लाश का ठिकाना तक नहीं बचा.. दूसरे को उसकी प्रेमिका समेत जान से मारकर लाश को चौराहे पर टांग दिया गया। कहने का मतलब इतना भर है कि तानाशाह कभी भी तानाशाह बनकर नहीं आता। उसके माथे पर भी ऐसा कुछ लिखा नहीं होता। वो अपार लोकप्रियता हासिल करने के बाद लोकतंत्र के घोड़े पर सवार हो राजपथ पर निकला करते हैं। चरम समर्थन तानाशाह का राजदंड होता है जिसके सहारे वो अजीब-अनोखे-नासमझी भरे-जानलेवा फैसले करता जाता है लेकिन सम्मोहित जनता उसका साथ देती है। पहलेपहल उससे सवाल नहीं होते, और उसके बाद वो सवालों की गुंजाइश नहीं छोड़ता। जिस दौर में राजनीति महत्वपूर्ण हो जाती है और राजनेता सबसे बड़े हीरो बन जाते हैं... ठीक उसी वक्त कलाकार अपने शेल में घुस जाते हैं। इक्का दुक्का अपनी प्रसिद्धि के दम पर विरोध उठाता भी है लेकिन सरकार के अनगिनत हाथ उसका गला घोंट ही देते हैं। पूरा युग गुज़रने के बाद जनता को याद आता है कि जब तराजू एक तरफ झुका हुआ था और कोई शिकवा तक करनेवाला नहीं था .. उस वक्त किसी अकेले आदमी ने खड़े होकर कहा था कि ये बेइमानी है।
दूसरे विश्वयुदध के चुनिंदा फोटो लगाने के सिलसिले में आज दो तस्वीरें लगा रहा हूं। एक है इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी की वो तस्वीर जो 9 मई 1936 को खींची गई। मुसोलिनी अपने शीर्ष पर था। रोम के ऐतिहासिक महल की बालकनी में खड़े होकर वो जनता का अभिवादन कर रहा है। दूसरी तस्वीर सिर्फ 9 साल बाद 29 अप्रैल 1945 की है। इटली की सेनाओं की हार के बाद बचकर भागने की कोशिश करता मुसोलिनी पकड़ लिया जाता है और उसे गिरफ्तार करके गोली मार दी जाती है। 29 अप्रैल को उसकी लाश एक गैस स्टेशन के पास लाकर टांग दी जाती है। उसी के देशवासियों ने नफरत से भरके उस लाश पर पत्थर फेंके, थूका और गालियां दीं।
(इति इतिहास श्रृंखला)

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

जब चंद्रास्वामी ने ब्रिटेन के अगले पीएम की भविष्यवाणी की..

साल 1975 की गर्मियां थीं। कुंवर नटवर सिंह ब्रिटेन में उन दिनों भारतीय उप उच्चायुक्त के तौर पर काम कर रहे थे। इस पद पर नौकरी करनेवाले के पास कई ज़िम्मेदारियां होती हैं, जिनमें से एक है अपने देश से आए नामी-गिरामी लोगों की मुरादें पूरी करना। नटवर सिंह को नहीं मालूम था कि इन गर्मियों में उन्हें एक 27-28 साल के तांत्रिक की मेज़बानी अनमना होकर ही सही लेकिन करनी पड़ेगी। वो दौर राजस्थान के तांत्रिक चंद्रास्वामी के उभार का था। नौजवानी के दिनों में ही वो ना सिर्फ अपने क्षेत्र में नाम कर चुके थे बल्कि सियासी जमात में भी वो जाना पहचाना नाम थे, हालांकि उनका सुनहरा दौर अभी आना बाकी था।



बहरहाल, चंद्रास्वामी ने लंदन पहुंचकर नटवर सिंह से मुलाकात की। फिर एक दिन उन्हें और उनकी पत्नी को भोजन पर बुला लिया। इस मुलाकात में चंद्रास्वामी अपनी विद्या के बल पर नटवर सिंह की पत्नी को प्रभावित करने में कामयाब रहे। हां, नटवर सिंह को चंद्रास्वामी के तौर तरीके कुछ खास पसंद नहीं आए। कुछ ही दिन बाद भारत के विदेशमंत्री वाई बी चव्हाण कुछ देर के लिए लंदन के हीथ्रो पहुंचे। नटवर सिंह मुलाकात के लिए वहां गए। बातचीत के दौरान नटवर सिंह ने चव्हाण को बताया कि चंद्रास्वामी मुझसे लॉर्ड माउंटबेटन और मार्गरेट थैचर से मुलाकात करने की गुज़ारिश कर रहे हैं। चव्हाण ने नटवर की उम्मीद के खिलाफ जाते हुए इन मुलाकातों के लिए हरी झंडी दे दी। नटवर सिंह फंस चुके थे। मन मारकर उन्होंने भारत के आखिरी अंग्रेज़ गवर्नर जनरल रहे माउंटबेटन को फोन मिला दिया। माउंटबेटन ने मुलाकात की इच्छा तो जताई लेकिन साथ ही खेद भी प्रकट कर दिया क्योंकि वो अगले ही दिन छुट्टी मनाने के लिए उत्तरी आयरलैंड के लिए रवाना हो रहे थे। नटवर सिंह को राहत ही मिली। उन्होंने चंद्रास्वामी को बता दिया कि माउंटबेटन से मुलाकात संभव नहीं है। ज़रा मायूस हुए युवा चंद्रास्वामी ने थैचर से मिलने की इच्छा जताई। उस वक्त मार्गरेट थैचर इंग्लैंड की विपक्षी कंज़र्वेटिव पार्टी की नेता नियुक्त हुई थीं। नटवर सिंह मुलाकात कराने को लेकर यूं भी मन से तैयार नहीं थे लेकिन उनके सामने संकट था। उन्हें डर था कि अगर मुलाकात के दौरान युवा तांत्रिक ने कोई अभद्र या असभ्य व्यवहार कर डाला तो वो खुद भी थैचर के सामने बेवकूफ नज़र आएंगे। बहरहाल, नटवर सिंह ने समय मांगा और वो मिल भी गया। थैचर को नटवर सिंह ने चंद्रास्वामी का संक्षिप्त परिचय दे दिया था लेकिन थैचर समझ नहीं पा रही थीं कि आखिर चंद्रास्वामी उनसे मिलना क्यों चाहते हैं। सच तो ये है कि थैचर की भी उस मुलाकात में कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन भारतीय उपउच्चायुक्त की तरफ से आए निवेदन पर उन्हें दस मिनट खर्चने में कोई बुराई नहीं लगी। अगले हफ्ते नटवर सिंह चंद्रास्वामी को लेकर हाउस ऑफ कॉमंस के दफ्तर पहुंच गए। हाउस ऑफ कॉमंस को आप ब्रिटेन की लोकसभा समझें। थैचर वहीं एक छोटे से कार्यालय में बैठती थीं। चंद्रास्वामी ने मुलाकात से पहले पूरी तैयारी कर ली। साधु का पूरा वेष धर कर उन्होंने माथे पर चौड़ा तिलक लगाया। हाथ में छड़ी ले ली और गले में रुद्राक्ष की माला डाल ली। नटवर सिंह चंद्रास्वामी के इस रंग ढंग से बहुत असहज महसूस कर रहे थे, लेकिन चंद्रास्वामी तो अपनी धुन में मस्त पूरे आत्मविश्वास से लबरेज़ होकर शाही गलियारों में चल रहे थे। लोग उन्हें देख रहे थे और चंद्रास्वामी इस बात का आनंद उठा रहे थे।
दोनों थैचर के कमरे में पहुंचे। उनके संसदीय सचिव एडम बटलर भी कमरे में मौजूद थे। जान पहचान का छोटा सा दौर चला जिसके बाद शायद मार्गरेट थैचर ने मुलाकात जल्दी निबटाने के इरादे से सीधे पूछ लिया कि चंद्रास्वामी उनसे मिलना क्यों चाहते थे...
अंग्रेज़ी से अनजान तांत्रिक चंद्रास्वामी के लिए अनुवादक का काम नटवर सिंह को करना था। चंद्रास्वामी जल्दी में भी नहीं थे। उन्होंने इत्मीनान से कहा- जल्द ही आपको पता चल जाएगा। थैचर ने इस अजीब से तांत्रिक को देखकर कहा- मैं इंतज़ार कर रही हूं। घड़ी की सुइयां अपनी गति से बढ़ रही थीं। मुलाकात के लिए दस मिनट का वक्त मुकर्रर हुआ था। चंद्रास्वामी अपनी अदाओं से वक्त खत्म कर रहे थे। कुछ देर में चंद्रास्वामी ने एक पेपर और पैन की मांग की। इसके बाद उन्होंने कागज़ फाड़कर थैचर के हाथ में पांच पर्चियां पकड़ा दीं और कहा कि वो कोई भी पांच अलग अलग सवाल इन पर्चियों में लिखकर रख लें । नटवर सिंह थैचर के चेहरे पर चिढ़ का एक हल्का सा भाव देख पा रहे थे लेकिन कुछ कर पाने में असमर्थ थे। चंद्रास्वामी फॉर्म में थे। उन्होंने सवाल लिखी पर्चियों को मुचड़कर गेंद जैसा बना देने को कहा। अब चंद्रास्वामी ने थैचर से कहा कि वो पांचों में से एक पर्ची खोलकर अपना सवाल देख लें। थैचर ने देखा और उधर चंद्रास्वामी ने हिंदी में बताया कि थैचर ने लिखा क्या था। नटवर सिंह ने अनुवाद कर दिया। थैचर के चेहरे से अचानक चिढ़ गायब होने लगी। उसकी जगह अब उत्सुकता थी। ज़ाहिर है, चंद्रास्वामी का निशाना ठीक लगा था। इसके बाद अगला सवाल भी चंद्रास्वामी ने ठीक बताया। चौथे सवाल तक आते-आते तो थैचर की भाव भंगिमा पूरी तरह से बदल गई थी। चंद्रास्वामी का उम्दा प्रदर्शन नटवर सिंह की लाज बचा रहा था। अब तक थैचर अपने सोफे के किनारे तक आ पहुंची थीं। चंद्रास्वामी ने भी संकोच छोड़कर अपनी चप्पेलें उतारीं और सोफे पर पद्मासन में जम गए। नटवर सिंह को कुछ बुरा लगा लेकिन वो थैचर को देखकर हैरान थे क्योंकि अब चंद्रास्वामी के तेवर उन्हें परेशान नहीं कर रहे थे। वो तो अब उनसे और सवाल करना चाहती थीं, लेकिन अब बारी चंद्रास्वामी की थी। कुछ जवाब देने के बाद अचानक चंद्रास्वामी ने बड़ी ही अदा से घोषणा कर दी कि अब वो किसी सवाल का जवाब नहीं देंगे क्योंकि सूर्य अस्त हो चुका है। बेचारे नटवर सिंह इस बात का अनुवाद करने से पहले झेंप गए। वो विपक्ष की नेता के सामने बैठे थे और चंद्रास्वामी अब तेवर दिखाने पर आमादा थे। खैर, नटवर सिंह ने इस बात का भी अनुवाद कर डाला। एक बार फिर नटवर सिंह के हैरान होने की बारी थी। मार्गरेट थैचर उनसे चंद्रास्वामी के साथ एक और मुलाकात का निवेदन कर रही थीं। नटवर सिंह इस पासा उलट के लिए कहां तैयार थे, मगर चंद्रास्वामी तो चंद्रास्वामी थे। उन्होंने कहा- मंगलवार को दोपहर ढाई बजे नटवर सिंह जी के घर पर।
ब्रिटेन की आला नेता को इस तरह वक्त दिए जाने की ढीठता पर नटवर की नाराज़गी दबी नहीं रही। उन्होंने चंद्रास्वामी को हरकतों से बाज़ आने को कहा और बोले कि वक्त देने से पहले कम से कम थैचर से उनकी सुविधा तो पूछ लो, आखिर ये हिंदुस्तान तो नहीं है, लेकिन अब चंद्रास्वामी कहां मानने वाले थे। उन्होंने नटवर सिंह से कहा- कुंवर साहब, अनुवाद कर दीजिए और फिर देखिए। नटवर सिंह खुद कहते हैं कि मैं तो हैरत में ही पड़ गया जब थैचर ने मेरे घर का पता पूछा , लेकिन अभी हैरान होने का सिलसिला पूरा नहीं हुआ था। चलने से पहले जाने कहां से चंद्रास्वामी ने अपने हाथ में ताबीज़ निकाल लिया। बोले कि इनसे कहिए जब मुझसे मिलने आएं तो ये ताबीज़ बाईं बाजू में पहनकर आएं। नटवर सिंह गुस्से से धधक रहे थे। उन्हें लग रहा था कि किसी ना किसी बेवकूफी पर डांटा ही जानेवाला है। साफ कह दिया कि इस देहाती बकवास का अनुवाद मैं नहीं करनेवाला। थैचर ने हस्तक्षेप करते हुए पूछा कि साधु महाराज क्या कह रहे हैं। बेचारे नटवर सिंह ने सहमते हुए कहा - मैं माफी चाहता हूं मिसेज थैचर लेकिन चंद्रास्वामी चाहते हैं कि आप इस ताबीज़ को अपनी बाईं बाजू में बांधकर आएं।
थैचर ने चुपचाप वो ताबीज़ लेकर रख लिया। चंद्रास्वामी और नटवर सिंह ने अब थैचर से जाने की अनुमति मांगी मगर चंद्रास्वामी को ना जाने क्या सूझा कि फिर बोले- कुंवर साहब, कृपया थैचर जी से कहिए कि मंगलवार को उन्हें लाल रंग की पोशाक पहननी चाहिए। अब नटवर सिंह बिलकुल सहने के मूड में नहीं थे। उनका मन हुआ कि वहीं चंद्रास्वामी की पिटाई शुरू कर दें लेकिन वो फंस चुके थे। उन्होंने चंद्रास्वामी को समझाया कि किसी महिला को उसके पहनावे के लिए कुछ कहना अभद्रता है। थैचर हिंदी में हो रही बातचीत नहीं समझ पा रही थीं लेकिन दोनों के चेहरे देख ज़रूर रही थीं। ना चाहते हुए भी नटवर सिंह ने फर्श की तरफ ताकते हुए अनुवाद कर डाला। अगले मंगलवार दोपहर ठीक ढाई बजे ब्रिटेन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी की नेता और भविष्य में इंग्लैंड की आयरन लेडी बननेवाली मार्गरेट थैचर नटवर सिंह के घर के दरवाज़े पर खड़ी थीं। वो ना लाल पोशाक पहनना भूली थीं और ना ताबीज़ बांधना। गदगद चंद्रास्वामी ने उस दिन थैचर के ना जाने कितने सवालों के जवाब खुशी खुशी दिए। फिर थैचर ने असली सवाल पूछा कि वो कभी प्रधानमंत्री बन सकेंगी या नहीं... चंद्रास्वामी ने उन्हें निराश नहीं किया। कहा- आप पीएम बन जाएंगी और नौ, ग्यारह या तेरह साल तक पद पर रहेंगी।
थैचर को अपने पीएम बनने पर तो यकीन था लेकिन उन्हें कार्यकाल की अवधि ज़्यादा लगी। खैर, उन्होंने आखिरी सवाल पूछा । वो जानना चाहती थीं कि वो पीएम बनेंगी कब तक। तांत्रिक चंद्रास्वामी के पास इस सवाल का भी जवाब था, उन्होंने कहा- अगले साढ़े तीन साल में। ठीक साढ़े तीन साल बाद थैचर अपने देश की प्रधानमंत्री बनीं और वो भी ग्यारह साल के लिए।
खैर, इस मुलाकात के बाद जब थैचर 1979 में पीएम बनकर कॉमनवेल्थ समिट में भाग लेने ज़ांबिया के लुसाका पहुंचीं तो नटवर सिंह भी वहीं थे। जब थैचर ने नटवर सिंह और उनकी पत्नी से मुलाकात की तो नटवर धीरे से फुसफुसाए- “Our man proved right.”
थैचर पल भर के लिए घबराई हुई दिखीं। नटवर सिंह को तुरंत अलग ले जाकर बोलीं, हाई कमिश्नर महोदय, हम इस बारे में बात नहीं करेंगे। नटवर सिंह ने भी अदब से जवाब दिया- कतई नहीं करेंगे प्राइम मिनिस्टर साहिबा, कतई नहीं।
इति इतिहास श्रृंखला
(नटवर सिंह की किताब Walking with Lions — Tales from a Diplomatic Past और इंडियन एक्सप्रेस ऑनलाइन से साभार)