शुक्रवार, 16 जून 2017

गांधी, चार्ली, चर्चिल और मशीन -3

1931 में जब चार्ली चैप्लिन गांधी से मिल रहे थे तब उन्हें बाज़ार में बढ़ते मशीनीकरण के नुकसानों का उतना अंदाज़ा नहीं था। दुनिया बहुत तेज़ी के साथ मशीनों पर निर्भर होती जा रही थी। पहले विश्वयुद्ध के बाद बर्बाद हुए देश तेज़ी से खड़े होने के लिए मशीनों पर सवार थे और जर्मनी उनमें सबसे आगे था। अंग्रेज़ों ने भी मैनचेस्टर में मशीनों से कपड़ा बनाकर दुनिया में खपा दिया था, नतीजतन भारत में कपड़े बनाने वाले बर्बादी के मुहाने पर खड़े थे। गांधी ने अपनी मुलाकात में चार्ली चैप्लिन को बता दिया था कि वो क्यों मशीन के विरोधी थे। उनके लिए मशीन अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद को मज़बूत करने का टूल थी और गांधी इसी टूल से खफा थे। वहीं टॉल्स्टॉय समेत विश्व के कई चिंतक मशीनों को ऐसा खलनायक मान रहे थे जो इंसान को प्रकृति से दूर कर रही है। चैप्लिन सिनेमा के बदलते स्वरूप के साथ बदल रहे थे और वो भी कमोबेश नई मशीनों पर आधारित था। मोशन फिल्में शुरू हो चुकी थीं लेकिन खुद को नकारे जाने के डर से चैप्लिन अपनी राह चलते रहे। थोड़ी बहुत आवाज़ उनकी फिल्मों में सुनाई तो देने लगी लेकिन चैप्लिन ने उन्हें अभी भी गूंगा ही रखने का फैसला लिया। दुनिया ग्रेट डिप्रेशन से गुज़र रही थी। अमेरिका से शुरू हुआ संकट आगे बढ़ रहा था। साफ दिखने लगा था कि मंदी गहरा रही है। उस दौरान सोचने समझनेवालों के लिए यही हॉट टॉपिक रहा होगा कि अब आगे क्या...
1936 में डोरोथिया द्वारा फ्लोरेंस थॉम्पसन का
 खींचा गया मशहूर फोटो, इसे ग्रेट डिप्रेशन का सबसे
ताकतवर प्रतीकात्मक फोटो माना जाता है
और फिर 1934 आ गया। सिटी लाइट्स की कामयाबी ने चैप्लिन को देवता बना दिया था। पैसे और तारीफ ने उन्हें ऐसा बौराया कि वो रात-दिन बस कुछ भी करते लेकिन ना फिल्म करते और ना फिल्म के बारे में बात। एक दिन किसी युवा आलोचक की टिप्पणी ने चैप्लिन को निराश कर दिया। उसने लिखा था कि सिटी लाइट्स बहुत अच्छी फिल्म है लेकिन इसे संवेदनाओं की सीमा रेखा पर बनाया गया है और भविष्य में चैप्लिन को और यथार्थवादी फिल्में बनानी चाहिए। चैप्लिन उससे सहमत थे।
इसी तरह चैप्लिन एक बार किसी युवा पत्रकार से मिले। उसने उन्हें मिशिगन शहर के डेट्रायट के बारे में बताया। वहां किस तरह मज़दूरों से बुरी तरह काम लिया जाता है ये जानने के बाद चैप्लिन का दिमाग घूम गया। आगामी फिल्म मॉडर्न टाइम्स की भूमिका बन चुकी थी। हालात चैप्लिन को मशीन और इंसान की कहानी मॉडर्न टाइम्स बनाने के लिए मजबूर कर रहे थे। मिशिगन में मज़दूरी ऐसे कराई जाती थी कि मज़दूर पागल तक हो जाते थे। बस चैप्लिन ने अपनी फिल्म के मुख्य किरदार ट्रैम्प को भी वैसा ही दिखाना तय कर लिया। गरीब ट्रैम्प को फिल्म में अपनी हिरोइन के साथ मंदी, हड़ताल और बेरोजगारी झेलनी थी। खूबसूरत अभिनेत्री पॉलेट को गरीब नायक की प्रेमिका दिखाने के लिए मुंह पर राख मलनी पड़ी। वो बेचारी रो ही पड़ी, मगर चैप्लिन ने तय किया था कि इस बार गरीबी को इस तरह दिखाना है कि वो सच्ची जान पड़े।
फिल्म मॉडर्न टाइम्स, 1936
दुनिया में उस वक्त पूंजीवाद और साम्यवाद की बहस चल रही थी। कई अखबारों ने छाप दिया कि चैप्लिन की नई फिल्म वामपंथ का समर्थन करती है। चैप्लिन ने ना तो फिल्म को समर्थक कहा और ना ही विरोधी। फिल्म रिलीज़ हुई और पहले हफ्ते दर्शकों ने रिकॉर्ड बना डाला। दूसरा हफ्ता भीड़ थोड़ी कम हुई। घबराए हुए चैप्लिन ने न्यूयॉर्क और लॉस एंजेल्स से दूर होनोलुलू जाने का फैसला कर लिया। ये फैसला चैप्लिन ने बहुत जल्दबाज़ी में लिया और जैसे ही वो समुद्री जहाज से होनोलुलू में उतरे तो हैरत में पड़ गए। बड़े-बड़े होर्डिंग्स और प्रेस उनका वहीं इंतज़ार कर रही थी। कोई जगह नहीं थी जहां मशहूर चैप्लिन जा छिपते। खैर, चैप्लिन दौड़ते -भागते रहे और मॉडर्न टाइम्स कामयाब हो गई। इस फिल्म का एक सीन बेहद यादगार हैै और मैं उसे ब्लॉग में लगा भी रहा हूं। कॉमेडी में ट्रेजेडी का ये नायाब उदाहरण है। इस सीन में चैप्लिन खड़े होकर नट बोल्ट कस रहे हैं। उनके सामने एक बेल्ट चल रही है। बेल्ट की अपनी रफ्तार है और मज़दूर को उसी रफ्तार से काम करना है। किरदार ऐसा करने की कोशिश में मशीन के मुंह में चला जाता है और बड़ी मुश्किल से बाहर आ पाता है। वो बाहर आ तो जाता है लेकिन पागल हो जाता है।
फ्रांस के मशहूर दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र और सिमोन डी बुवा ने आगे चलकर अपने जर्नल का नाम भी उसी फिल्म के नाम पर रखा। अमेरिका में वो दौर भुखमरी और हड़ताल का था। फिल्म कमाई के मामले में सिवाय अमेरिका के हर जगह कामयाब थी। उस फिल्म से पहले भी कई फिल्मों ने मशीनों को इंसान का दुश्मन बताने की कोशिश की थी, लेकिन चैप्लिन की अपील अलग ही थी। लोग जो महसूस कर रहे थे वही स्क्रीन पर देख रहे थे। हालांकि मशीनों के खिलाफ बात करने को वामपंथ ठहरा दिए जाने का खतरा था। तब तक ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी में तो वामपंथियों को देशद्रोही से लेकर ना जाने क्या क्या कहा जाने लगा था। इस बात को समझने के लिए आपको एक अमेरिकी फिल्म लेखक डाल्टन ट्रंबो के बारे में पढ़ना चाहिए। उन पर फिल्म भी बन चुकी है। कैसे उन्हें वामपंथी होने की सज़ा पूरी बेहरमी से दी गई थी जबकि ना वो किसी कत्ल में शामिल थे और ना किसी साज़िश में। इसके आगे बताऊंगा कि कैसे चैप्लिन पर भी वामपंथी होने का शक किया गया। सबको हंसाने वाला वो हीरो किस तरह सबको डरानेवाले हिटलर के सामने ताल ठोक कर खड़ा हो गया। वो किसी तरफ नहीं था, सिर्फ अपनी तरफ था पर सबकी किस्मत में वो वक्त देखना लिखा होता है जब वो अकेला पड़ जाता है। चैप्लिन अपवाद कैसे हो सकते थे भला....
क्रमश:
फिल्म मॉडर्न टाइम्स का भुला ना सकने वाला एक दृश्य



गुरुवार, 15 जून 2017

गांधी, चार्ली, चर्चिल और मशीन -2

चार्ली चैप्लिन महात्मा गांधी से मिलना चाहते थे जिसके लिए कैनिंग टाउन में डॉक्टर चुन्नीलाल कतियाल के यहाँ 22 सितम्बर 1931 की शाम का वक्त तय हुआ। खुद चैप्लिन ने इस रोचक मुलाकात को आत्मकथा में सहेजा है। उस वक्त का एक फोटो रिकॉर्ड्स में मिलता है जिसमें गांधी गाड़ी से बाहर आ रहे हैं और उन्हें लोगों ने चारों तरफ से घेर रखा है। जिस घर में उनकी चैप्लिन से मुलाकात तय थी वहीं से चैप्लिन उन्हें देख रहे थे। फोटो भी वहीं से खींचा गया है। गांधी को देखकर लगे नारों का ज़िक्र तो चैप्लिन की आत्मकथा में मिलता ही है, साथ में वो बताते हैं कि कैसे गांधी का पहनावा लंदन के हिसाब से एकदम बेतरतीब था। ज़ाहिर है बाहर ठंड थी और वो भी गीली.. लेकिन गांधी अपनी धोती लपेटे ही हर जगह सहजता से घूम रहे थे। वो जहां ठहरे थे वो भी कोई होटल नहीं था बल्कि एक स्लम था। नीचे फर्श पर ही उनका बिस्तर लगता था। चैप्लिन इस हिंदुस्तानी सादगी को गले से नीचे उतार ही नहीं पा रहे थे। गांधी से बातचीत के पहले चैप्लिन से एक युवती लगातार बात करती जा रही थी। बेचारे चैप्लिन को बहुत कुछ समझ नहीं आ रहा था लेकिन हां-हां करने की उनकी अपनी मजबूरी थी। तभी उस युवती को किसी महिला ने डांट लगाकर चुप कराया। ये शायद सरोजिनी नायडु थीं। आगे की मुलाकात का ब्यौरा चैप्लिन के ही शब्दों में पढ़िए। अनुवाद सूरज प्रकाश का है-
चैप्लिन से मुलाकात के पहले भीड़ के घेरे में गांधी, 1931


 मैंने गांधी की राजनैतिक साफगोई और इस्पात जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति के लिए हमेशा उनका सम्मान किया है और उनकी प्रशंसा की है। लेकिन मुझे ऐसा लगा कि उनका लंदन आना एक भूल थी। उनकी मिथकीय महत्ता, लंदन के परिदृश्य में हवा में ही उड़ गयी है और उनका धार्मिक प्रदर्शन भाव अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहा है। इंगलैंड के ठंडे भीगे मौसम में अपनी परम्परागत धोती, जिसे वे अपने बदन पर बेतरतीबी से लपेटे रहते हैं, में वे बेमेल लगते हैं। लंदन में उनकी इस तरह की मौजूदगी से कार्टून और कैरीकेचर बनाने वालों को मसाला ही मिला है। दूर के ढोल ही सुहावने लगते हैं। किसी भी व्यक्ति के प्रभाव का असर दूर से ही होता है। मुझसे पूछा गया था कि क्या मैं उनसे मिलना चाहूंगा। बेशक, मैं इस प्रस्ताव से ही रोमांचित था।



चार्ली चैप्लिन-गांधी की अविस्मरणीय मुलाकात, 22 सितंबर 1931
मैं उनसे ईस्ट इंडिया डॉक रोड के पास ही झोपड़ पट्टी जिले के छोटे से अति साधारण घर में मिला। गलियों में भीड़ भरी हुई थी और मकान की दोनों मंज़िलों पर प्रेस वाले और फोटोग्राफर ठुंसे पड़े थे। साक्षात्कार पहली मंज़िल पर लगभग बारह गुणा बारह फुट के सामने वाले कमरे में हुआ। महात्मा तब तक आये नहीं थे; और जिस वक्त मैं उनका इंतज़ार कर रहा था, मैं ये सोचने लगा कि मैं उनसे क्या बात करूंगा। मैंने उनके जेल जाने और भूख हड़तालों और भारत की आज़ादी के लिए उनकी लड़ाई के बारे में सुना था और मैं इस बारे में थोड़ा बहुत जानता था कि वे मशीनों के इस्तेमाल के विरोधी हैं।
आखिरकार जिस वक्त गांधी आये, टैक्सी से उनके उतरते ही चारों तरफ हल्ला गुल्ला मच गया। उनकी जय जय कार होने लगी। गांधी अपनी धोती को बदन पर लपेट रहे थे। उस तंग भीड़ भरी झोपड़ पट्टी की गली में ये अजीब नज़ारा था। एक दुबली पतली काया एक जीर्ण शीर्ण से घर में प्रवेश कर रही थी और उनके चारों तरफ जय जयकार के नारे लग रहे थे। वे ऊपर आये और फिर खिड़की में अपना चेहरा दिखाया। तब उन्होंने मेरी तरफ इशारा किया और तब हम दोनों ने मिल कर नीचे जुट आयी भीड़ की तरफ हाथ हिलाये।जैसे ही हम सोफे पर बैठे, चारों तरफ से अचानक ही कैमरों की फ्लैश लाइटों का हमला हो गया। मैं महात्मा की दायीं तरफ बैठा था। अब वह असहज करने वाला और डराने वाला पल आ ही पहुंचा था जब मुझे एक ऐसे विषय पर घाघ की तरह बौद्धिक तरीके से कुछ कहना था जिसके बारे में मैं बहुत कम जानता था। मेरी दायीं तरफ एक हठी युवती बैठी हुई थी जो मुझे एक अंतहीन कहानी सुना रही थी और उसका एक शब्द भी मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा था। मैं सिर्फ हां हां करते हुए सिर हिला रहा था और लगातार इस बात पर हैरान हो रहा था कि मैं उनसे कहूंगा क्या। मुझे पता था कि बात मुझे ही शुरू करनी है और ये बात तो तय ही थी कि महात्मा तो मुझे नहीं ही बताते कि उन्हें मेरी पिछली फिल्म कितनी अच्छी लगी थी और इस तरह की दूसरी बातें। और मुझे इस बात पर भी शक था कि उन्होंने कभी कोई फिल्म देखी भी होगी या नहीं। अलबत्ता, एक भारतीय महिला की आदेश देती सी आवाज़ गूंजी और उसने उस युवती की बक बक पर रोक लगा दी: "मिस, क्या आप बातचीत बंद करेंगी और मिस्टर चैप्लिन को गांधी जी से बात करने देंगी?"
भरा हुआ कमरा एक दम शांत हो गया। और जैसे ही महात्मा के चेहरे पर मेरी बात का इंतज़ार करने वाले भाव आये, मुझे लगा कि पूरा भारत मेरे शब्दों का इंतज़ार कर रहा है। इसलिए मैंने अपना गला खंखारा। "स्वाभाविक रूप से मैं आज़ादी के लिए भारत की आकांक्षाओं और संघर्ष का हिमायती हूं," मैंने कहा,"इसके बावज़ूद, मशीनरी के इस्तेमाल को ले कर आपके विरोध से मैं थोड़ा भ्रम में पड़ गया हूं।" मैं जैसे जैसे अपनी बात कहता गया, महात्मा सिर हिलाते रहे और मुस्कुराते रहे। "कुछ भी हो, मशीनरी अगर नि:स्वार्थ भाव से इस्तेमाल में लायी जाती है तो इससे इन्सान को गुलामी के बंधन से मुक्त करने में मदद मिलनी चाहिये और इससे उसे कम घंटों तक काम करना पड़ेगा और वह अपना मस्तिष्क विकसित करने और ज़िंदगी का आनंद उठाने के लिए ज्यादा समय बचा पायेगा।"
"मैं समझता हूं," वे शांत स्वर में अपनी बात कहते हुए बोले, "लेकिन इससे पहले कि भारत इन लक्ष्यों को प्राप्त कर सके, भारत को अपने आपको अंग्रेजी शासन से मुक्त कराना है। इससे पहले मशीनरी ने हमें इंगलैंड पर निर्भर बना दिया था, और उस निर्भरता से अपने आपको मुक्त कराने का हमारे पास एक ही तरीका है कि हम मशीनरी द्वारा बनाये गये सभी सामानों का बहिष्कार करें। यही कारण है कि हमने प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य बना दिया है कि वह अपना स्वयं का सूत काते और अपने स्वयं के लिए कपड़ा बुने। ये इंगलैंड जैसे अत्यंत शक्तिशाली राष्ट्र से लड़ने का हमारा अपना तरीका है और हां, और भी कारण हैं। भारत का मौसम इंग्लैंड के मौसम से अलग होता है और भारत की आदतें और ज़रूरतें अलग हैं। इंगलैंड के सर्दी के मौसम के कारण ये ज़रूरी हो जाता है कि आपके पास तेज उद्योग हो और इसमें अर्थव्यवस्था शामिल है। आपको खाना खाने के बर्तनों के लिए उद्योग की ज़रूरत होती है। हम अपनी उंगलियों से ही खाना खा लेते हैं। और इस तरह से देखें तो कई किस्म के फर्क सामने आते हैं।"
गांधी की लोकप्रियता दिखाता एक कार्टून, 1931 का हिंंदुस्तान टाइम्स
मुझे भारत की आज़ादी के लिए सामरिक जोड़ तोड़ में लचीलेपन का वस्तुपरक पाठ मिल गया था और विरोधाभास की बात ये थी कि इसके लिए प्रेरणा एक यथार्थवादी, एक ऐसे युग दृष्टा से मिल रही थी जिसमें इस काम को पूरा करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति थी। उन्होंने मुझे ये भी बताया कि सर्वोच्च स्वंतत्रता वह होती है कि आप अपने आपको अनावश्यक वस्तुओं से मुक्त कर डालें और कि हिंसा अंतत: स्वयं को ही नष्ट कर देती है।
जब कमरा खाली हो गया तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं वहीं रह कर उन्हें प्रार्थना करते हुए देखना चाहूंगा। महात्मा फर्श पर चौकड़ी मार कर बैठ गये और उनके आस पास घेरा बना कर पांच अन्य लोग बैठ गये। ये एक देखने योग्य दृष्य था। लंदन के झोपड़ पट्टी वाले इलाके के बीचों बीच एक छोटे से कमरे के फर्श पर छ: मूर्तियां पद्मासन में बैठी हुईं। लाल सूर्य छतों के पीछे से तेजी से अस्त हो रहा था और मैं खुद सोफे पर बैठा उन्हें नीचे देख रहा था। वे विनम्रता पूर्वक अपनी प्रार्थनाएं कर रहे थे। क्या विरोधाभास है, मैंने सोचा, मैं इस अत्यंत यथार्थवादी व्यक्ति को, तेज कानूनी दिमाग और राजनैतिक वास्तविकता का गहरा बोध रखने वाले इस शख्स को देख रहा था। ये सब आरोह अवरोह रहित बातचीत में विलीन हो रहा प्रतीत हो रहा था। गांधी से अपनी मुलाकात के बारे में चैप्लिन इतना ही बताते हैं।

1931 की ये मुलाकात लोगों की नज़र में भले खत्म हो गई हो लेकिन विचारवान चार्ली ने इससे क्या सीखा वो 1936 में तब पता चला जब वो फिल्म मॉडर्न टाइम्स लेकर पेश हुए। चैप्लिन अपनी फिल्म में मशीनों और मशीनों के पाश में फंसी मनुष्यता की खिल्ली उड़ाते दिख रहे थे। चैप्लिन आत्मकथा में मानते हैं कि एक पत्रकार के साथ हुई उनकी बातचीत ने भी उन्हें मॉडर्न टाइम्स तक पहुंचने का रास्ता दिखाया। ये दूसरी बात है कि फिल्मों में अपने विषयों के चुनाव की वजह से लोग चैप्लिन के भीतर अब राजनीतिक रुझान ढूंढने लगे थे। पूंजीवाद के साथ कदम मिलाकर चल रहे अंधराष्ट्रवाद और साम्यवाद के बीच अपनी राह पर मस्त चलते चार्ली चैप्लिन को अमेरिका और इंग्लैंड की खुफिया एजेंसियों के राडार पर आना अभी बाकी थी।
क्रमश:
















बुधवार, 14 जून 2017

गांधी, चार्ली, चर्चिल और मशीन -1

साल 1936 में जर्मनी ओलंपिक खेलों का मेजबान था। एडोल्फ हिटलर के लिए ये मौका था जब वो दिखा सकता था कि अट्ठारह साल पूर्व पहली आलमी लड़ाई में हार चुका जर्मनी फिर से उठ खड़ा हुआ है। इन खेलों के सहारे वो जर्मनों की शर्मिंदगी को आत्मविश्वास में तब्दील कर डालना चाहता था। उसने टीवी नाम की मशीन का इस्तेमाल किया और पहली बार दुनिया में किसी खेल आयोजन का प्रसारण हुआ। वाकई वो जर्मनी की भव्यता का अद्भुत प्रदर्शन था। इसे समझने के लिए आप चाहें तो हॉलीवुड की मशहूर फिल्म रेस देख सकते हैं। फिल्म एक ऐसे अश्वेत एथलीट पर है जिसका जीतना हिटलर को भाता नहीं लेकिन वो नाज़ी जर्मनी के बड़े खिलाड़ियों को हराकर हिटलर का मान मर्दन करता है। ये वही ओलंपिक था जिसमें ध्यानचंद ने हॉकी स्टिक घुुमाकर हिटलर को सम्मोहित कर डाला था। ऑस्ट्रिया के वियना शहर में साल 1939 को ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए मूर्ति इसके ही बाद लगी । ठीक इसी दौरान दुनिया में विज्ञान कुलांचे भर रहा था। मशीनें और भी तेज़ हो रही थीं.. ज़्यादा स्मार्ट बन रही थीं। हर देश उत्पादन बढ़ाने के लिए मॉडर्न मशीनें चाहता था। पैसा कमाने की दौड़ में कोई किसी से पीछे नहीं छूटना चाह रहा था। तेज़ दौड़ती कारें.. दोगुनी-तिगुनी रफ्तार से सामान पैदा करते कारखाने.. सब कुछ तेज़ और ज़्यादा के बीच झूल रहा था।
1936 के ओलंपिक में जादू करते ध्यानचंद
पश्चिम से हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे गांधी इस दृश्य को देखकर सहमे हुए थे। जो डर वो सालों पहले हिंद स्वराज में व्यक्त कर चुके थे, अब वो हकीकत बनकर सामने खड़ा था। हिंद स्वराज में गांधी ने लिखा था- 'मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्‍यता की मुख्‍य निशानी है और वह महापाप है, ऐसा मैं तो साफ देख सकता हूँ।' जो वो देख समझ रहे थे उसे ठीक इसी दौरान फिल्मों का सबसे चमकता सितारा चार्ली चैप्लिन भी महसूस करने लगा था। हालांकि वो खुद नई मशीनों के सहारे अपने धंधे का विस्तार कर रहे थे मगर वो भूले नहीं थे कि उनका कल गरीबी की गोद में खेलकर ही दमकने वाला आज बना था। मशीनों के फेर में बढ़ती बेरोज़गारी और साथ ही खिंचते जा रहे काम के घंटे उन्हें परेशान करने लगे थे। टॉल्स्टॉय, इमरसन, रस्किन जैसे चिंतक मशीनों के चंगुल से आज़ाद करके मानवता को प्रकृति की तरफ ले जाना चाहते थे। वो अजब से धर्मसंकट में थे।
दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में गांधीजी, सितंबर,1931
अब मैं ले चलता हूं आपको साल 1931 में। जगह लंदन थी और मौका था दूसरे गोलमेज सम्मेलन का। महात्मा गांधी पहले गोलमेज़ सम्मेलन के नाकामयाब होने के बाद कांग्रेस की तरफ से प्रतिनिधि बनकर आए थे। दक्षिण अफ्रीका से हिंदुस्तान लौटने के बाद वो पहली बार विदेशी दौरे पर थे। वक्त बदल चुका था। दुनिया या तो उनसे प्यार कर रही थी या नफरत.. लेकिन नज़रअंदाज़ अब कोई नहीं कर सकता था। असहयोग आंदोलन के प्रयोग ने अंग्रेज़ों के साथ ही पूरी दुनिया को समझा दिया था कि गांधी नाम का प्रयोगवादी बिना हिंसा किए भी जो हासिल करना चाहता है वो धीरे-धीरे कर रहा है। उस वक्त के वायसराय विलिंगडन तो गांधी के सामने बेहद बेबस थे। उन्होंने अपनी बहन को एक खत लिखा था। उसमें गांधी के बारे में उनकी जो राय थी वो पढ़िए- ''अगर गाँधी न होता तो यह दुनिया वाकई बहुत खूबसूरत होती। वह जो भी कदम उठाता है उसे ईश्वर की प्रेरणा का परिणाम कहता है लेकिन असल में उसके पीछे एक गहरी राजनीतिक चाल होती है। देखता हूँ कि अमेरिकी प्रेस उसको गज़ब का आदमी बताती है लेकिन सच यह है कि हम निहायत अव्यावहारिक , रहस्यवादी और अंधिविश्वासी जनता के बीच रह रहे हैं जो गाँधी को भगवान मान बैठी है।'' भारत की जनता के तत्कालीन भगवान से मिलने के लिए चार्ली चैप्लिन भी उत्साहित थे। वो खुद अपनी फिल्म सिटी लाइट्स का प्रचार करने बचपन के शहर लंदन लौटे थे। उन्हें सुझाव मिला कि गांधी से मिलिए। मौका अच्छा था।
विंस्टन चर्चिल के साथ चार्ली चैप्लिन अक्सर गुफ्तगू करते थे
उससे ठीक कुछ रात पहले चैप्लिन उन विंस्टन चर्चिल और उनके सहयोगियों से डिनर पर मिले थे जिन्हें गांधी फूटी आंख पसंद नहीं था। अधनंगा फकीर कहकर चर्चिल ने ही गांधी का अपमान करने की कोशिश की थी। चैप्लिन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि- मैंने उन्हें बताया कि मैं गांधी जी से मिलने जा रहा हूं जो इन दिनों लंदन में हैं। "हमने इस व्यक्ति को बहुत झेल लिया है। ब्रैकेन ने कहा,"भूख हड़ताल हो या न हो, उन्हें चाहिये कि वे इन्हें जेल में ही रखें। नहीं तो ये बात पक्की है कि हम भारत को खो बैठेंगे।"
"गांधी को जेल में डालना सबसे आसान हल होगा, अगर ये हर काम करे तो " मैंने टोका, "लेकिन अगर आप एक गांधी को जेल में डालते हैं तो दूसरा गांधी उठ खड़ा होगा और जब तक उन्हें वह मिल नहीं जाता जो वे चाहते हैं वे एक गांधी के बाद दूसरा गांधी पैदा करते रहेंगे।" चर्चिल मेरी तरफ मुड़े और मुस्कुराये,"आप तो अच्छे खासे लेबर सदस्य बन सकते हैं।" ये चर्चिल का तंज था। चर्चिल का ज़िक्र चला है तो लिखता चलूं कि वो भारत पर राज करना इतना ज़रूरी समझते थे कि अप्रैल 1931 में कहा था - The loss of India will be the death blow of the British Empire। गलत नहीं थे चर्चिल। बहरहाल, इस मुलाकात के बाद चार्ली चैप्लिन को गांधी से मिलना था।


क्रमश:


रविवार, 5 मार्च 2017

साढ़े तीन इश्क की किश्त..

वो कॉफी बनाने के लिए किचन की तरफ चला गया तो सारिका भी बैठी नहीं रह सकी। ड्राइंगरूम में ही टहलने लगी। दीवार पर एक पेंटिंग सजी थी जिसके कोने में पेंटर का फ्रेंच नाम टंका था। कुछ याद नहीं आया कि साहिल को पेंटिंग का शौक कब रहा। अब सारिका का ध्यान साइड टेबल के ऊपर रखी गज़लों के बेतरतीब रिकॉर्ड्स पर था। उसे फिर से ख्याल आया कि साहिल तो गाने-बजाने के नाम पर सिर्फ लाउड पंजाबी गाने ही सुनता था तो ये गज़ल तक कब आ पहुंचा। एक बार तो कार में कौन सा गाना चलेगा इसी बात पर ऐसी लड़ाई हुई कि सारिका ने बीच सड़क में ही कार से उतरकर घर के लिए टैक्सी ले ली थी। क्या कमाल के दिन थे वो। छोटी सी बात पर प्यार,, और छोटी सी ही बात पर तकरार। लंबी सांस लेकर सारिका ने पलटकर ड्राइंगरूम से लगी बॉलकनी की तरफ कदम बढ़ाए। हवा में झूमती प्यारी-सी लिली जैसे मुस्कुराकर उसे ही देख रही थी। अरे.. ऐसी ही लिली तो थी सारिका के हॉस्टल के कमरे के बाहर भी जो अठखेलियां करती थीं। लिली ज़रा सी मुरझाती तो सारिका का मुंह कॉलेज में पूरा-पूरा दिन लटका रहता। साहिल उसे चिढ़ाता भी था- 'अरे.. आज लिली मुरझाई क्यों है....' साहिल को कभी फूलों का शौक नहीं था। कभी बहुत लड़ाई के बाद भी अगर सारिका को मनाने के लिए लाता तो कुछ भी ले आता। जब साथ थे तो कभी समझ ही नहीं सका कि उसे सिर्फ लिली पसंद है। आहट से सारिका चौंक गई। साहिल हाथ में कॉफी का मग लिए खड़ा था। हंसकर बोला- 'तो यहां भी लिली ढूंढ ली तुमने!!' सारिका के चेहरे पर हंसी नहीं थी। आंखों में आंसू थे। ज़बान पर सवाल- 'साहिल जब इतना ही बदलना था तो वक्त रहते क्यों नहीं बदले तुम....' साहिल को जैसे इस सवाल का दस सालों से इंतज़ार था। आंखों में आंखें डालकर कहा- 'सारिका, मैं बदल रहा था धीरे-धीरे.. तुम्हारे पास लेकिन महसूस करने का वक्त नहीं था।' सारिका का मोबाइल बजने लगा। कोई पंजाबी गाना था.. वैसा ही जैसा साहिल को दस साल पहले पसंद था। झट से फोन काटकर उसने पर्स उठा लिया- 'सॉरी साहिल, उनका फोन है। मैं चलती हूं। फिर कभी मिलते हैं। अब तो हम इसी शहर में आ गए हैं।'
'वो तो ठीक है सारिका, लेकिन जैसे सालों बाद आज अचानक मिली हो वैसे ही अब अचानक गायब मत हो जाना'' फिर से साहिल ने उसे अपनी आदत के मुताबिक छेड़ा लेकिन सारिका वाकई जल्दी में थी। सामान उठाकर दरवाज़े की तरफ चल दी.. बस इतना ही बोली- 'देखते हैं साहिल...'

(साढ़े तीन इश्क की किश्त-1)

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

JNU - फिर गिरा हिंदू दक्षिणपंथ का नजला



कल का दिन एक खबर से खत्म हुआ और सुबह की शुरुआत एक नई खबर से हुई।  रात जो आखिरी खबर पढ़ी वो जेएनयू मामले के बाबत थी। रात जो खबर मिली वो थी कि गृह मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली जांच एजेंसियों ने जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष की आनन-फानन में गिरफ्तारी को दिल्ली पुलिस की अतिउत्साही कार्रवाई करार दिया है। सुबह जो पढ़ी वो खबर थी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें जेएनयू मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी एनआईए से कराए जाने की मांग की गई थी। माननीय अदालत ने इसे प्रीमैच्योर बताया और कहा कि पहले दिल्ली पुलिस को जांच पूरी कर लेनी चाहिए। इस बीच अपने अजीब और अनोखे कारनामों के लिए सुर्खियां बटोरनेवाले सुब्रह्ण्यम स्वामी जेएनयू को चार महीने तक बंद किए जाने का बयान देने से खुद को रोक नहीं सके। ये वैसा ही अतिउत्साह और प्रीमैच्योरिटी है जो दिल्ली पुलिस और याचिकाकर्ता ने ऊपर उल्लिखित मामलो में दिखाए। वैसे गृहमंत्री ने भी हाफिज सईद का नाम लेकर इस मामले में एक तरह की अतिश्योक्ति ही की थी मगर वो ठेठ राजनेता हैं तो बहुत मुमकिन है कि अपने विरोधियों की छवि धूल में मिला देने की नीयत से ही उन्होंने भारत के दुश्मन के साथ कार्यक्रम का नाम जोड़ा हो।
जेएनयू मामला अब एक ऑक्टोपस है जिसकी 8 भुजाएँ हैं। हर भुजा की अपनी जटिलता है और अपने पक्ष-विपक्ष हैं। इस मुद्दे को छोटी सी पोस्ट या लंबे से लेख में समेट पाना उतना भी आसान नहीं जितना ज़िंदाबाद या मुर्दाबाद के नारे लगा लेना है। इस पूरे उलझाव में जो एक अकेली बात सबसे साफ समझ आती है वो ये कि कुछ तत्व जिनका राष्ट्रवाद पर दावा है बेहद जोशो जुनून में हैं। ऐसे तत्वों की अगुवाई सुब्रह्णयम स्वामी जैसे लोग करते हैं। घरेलू राजनीति को फॉलो करनेवाला कोई भी शख्स आसानी से समझ सकता है कि इस जोश के पीछे मुद्दे की गंभीरता कम,  पुरानी अदावत ज्यादा है। संघ संचालित पत्र-  पत्रिकाओं के अलावा और तमाम हिंदू दक्षिणपंथियों को जेएनयू पर गुस्सा क्यों आता है ये समझना इतना भी मुश्किल नही। एलजीबीटी से लेकर किस ऑफ लव तक ऐसे तमाम बहाने हैं जो संघ और उसकी लाइन पर चलनेवालों को जेएनयू से लगातार खफा रखते हैं। ज़ाहिर है, जेएनयू परिसर में वामपंथियों का लंबे वक्त से कायम दबदबा भी संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों को कभी नहीं सुहाया। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा फिर भी अलग बात है जो तकनीकी तौर पर लोकतंत्र के लिए हानिकारक भी नही मगर राजनीतिक रास्ते से प्रतिस्पर्धी को हरा पाने में नाकाम जब एक पक्ष साज़िशों पर उतर आए तो खतरे का सायरन बजने लगता है। ये बात तब और गंभीर हो जाती है जब साजिश का मैदान एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हो। इन साजिशों को दुनिया ने सूंघ लिया है। बेवजह नहीं कि दुनियाभर के विश्व विद्यालयों से 455 शिक्षाविद् बयान जारी कर रहे हैं। बयान बेहद गंभीर और गहरे निहितार्थ लिए हुए है- ''जेएनयू, विश्वविद्यालयों के भीतर आलोचनात्मक सोच, लोकतांत्रिक असहमति, छात्र सक्रियता, और कई राजनीतिक मान्यताओं की बहुलता को गले लगाने वाली सोच के साथ खड़ा है. ये बेहद अहम बात है और मौजूदा सरकारें इस माहौल खत्म कर देना चाहती है. और हम जानते हैं कि ये अकेले भारत की दिक्कत नहीं है.''
बयान की आखिरी लाइन डराती है। अकेले भारत में ही नही दुनिया भर में चरमपंथी ताकतें लोकतंत्र के खोल में घुसकर असहमतियों का खात्मा  कर रही हैं। कई बार सरकारें ये काम खुद ना करके अपने अनुयायियों से करा लेती है और बदले में उन्हें बिना शक अभयदान मिल जाता है। पटियाला हाउस कोर्ट परिसर के बाहर छात्रों और पत्रकारों के साथ जो हुआ वो शायद उसका सबसे ताजा और मुफीद उदाहरण है। करनेवाले अगर अभी भी आज़ाद घूम रहे हैं और पुलिस कमिश्नर सिर्फ अज्ञात में मामला दर्ज कर बहाने बना रहे हैं तो शिक्षाविदों का बयान और पुष्ट हो रहा है। इस बीच मारपीट करनेवाले विधायक ने खुलेआम टीवी पर कहा है कि उस वक्त मेरे पास रिवाल्वर होती तो  मैं गोली मार देता। वहीं पत्रकारों से बद्तमीज़ी करनेवाले वकील की पहचान पूरी सोशल मीडिया बिरादरी में हो चुकी  है लेकिन दिल्ली पुलिस अनजान बन कर गिरफ्तारियों से बच रही है। कल जिस तरह दिल्ली के इतिहास में पहली दफा पत्रकारों और संपादकों ने विरोध मार्च निकाला वो भी उस दबाव का एक प्रतीकात्मक विरोध है जो लगातार पौने दो साल से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया पर बनाया गया है।
इस पूरे विमर्श में अफजल की बात इसलिए नही लिखी जा रही है क्योंकि उस पर कानून की राय एकदम साफ है। कल पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी ने भी कहा कि अफज़ल को फांसी देने का विरोध देशद्रोह नहीं है और ना ही पाकिस्तान ज़िंदाबाद का नारा देशद्रोह है।
यहां एक बात साफ कर देना ज़रूरी है कि इसका अर्थ ये भी नहीं है कि भारत मुर्दाबाद के नारे सहे जाने चाहिए लेकिन देशद्रोह जिस किस्म का गंभीर अपराध है ये उसमें फिट नहीं बैठता। अपने दिलो दिमाग में देशद्रोह की परिभाषा तय करना अलग बात है और अदालत में कानून की धाराओं के आधार पर उसे साबित करना बिलकुल दूसरी ही बात है। अब मामला चूंकि कोर्ट में है इसलिए कानूनविदों और वकीलों को इस पर भिड़ने देना चाहिए। फिर भी एक छोटी सी बात लिखने के साथ मैं इस लेख को खत्म करना चाहता हूं। अफज़ल गुरू की फांसी के फैसले के वक्त बहुत से लोग इसके विरोध में थे। सबके विरोध की अपनी ही वजहें थीं। कुछ उसे निर्दोष मानते होंगे, कुछ उसे अपना हीरो तो कुछ सिर्फ मृत्युदंड के खिलाफ थे। जो कार्यक्रम जेएनयू में जारी था वो अफज़ल की फांसी के विरोध में था। इस में एआईएसएफ और डीएसयू दोनों शामिल थे। जहां एआईएसएफ मुख्यधारा का छात्र संगठन है, वहीं डीएसयू सीपीआई -माओवादी का अंग है। डीएसयू फार लेफ्ट है और अति पर जाना उसकी फितरत है जैसा वो कश्मीर की आज़ादी के साथ कथित रूप से भारत की बर्बादी के नारे लगाकर साबित हुआ भी। अधिकतर दक्षिणपंथी इस जटिलता में ना जाने के इच्छुक हैं और ना इससे परिचित ही हैं। उन्हें सिर्फ मौका हाथ लगा है और वो इसमें जिस किसी को लपेट सकते हैं, लपेट रहे हैं। जेएनयू को लेकर इन सबकी एक तयशुदा राय है और इस बार रोहित वेमुला से संबंधित आंदोलन से ध्यान हटाने के लिए शोर मचाना और ज़रूरी भी हो गया था। क्या हैरत है कि वेमुला मामले पर अपने खिलाफ नारे झेल चुके प्रधानमंत्री भी इस मसले को बड़ा बनता देख रहे हैं मगर चुप हैं। कहीं इस मामले के विस्तार में उन्हें अपना और अपनी सरकार का फायदा तो नहीं दिख रहा..







रविवार, 31 जनवरी 2016

गांधी के हिस्से में आया एक प्रेमी जोड़ा



गांधी उसे भी आकर्षित करते थे और मुझे भी. तमाम आकर्षण के बावजूद अब तक वो गांधी म्यूजियम नहीं गई थी. हल्की सर्दी, कुछ देर की बूंदाबांदी और थोड़ी धूप मौसम में मीठापन घोल रही थी. दिल्ली की सड़क पर कार फर्राटे भर कहीं भी दौड़ रही थी. मैंने अचानक ही कहा- आज ऑफिस मत जाओ.वो कभी बेवजह ऑफिस छोड़ने वालों में से नहीं थी. पलटकर वजह पूछी. वजह कोई खास थी नहीं. मैंने दो वजह फिर भी बताई- एक तो मौसम बहुत अच्छा है इसे बर्बाद नहीं करते. दूसरा ये कि गांधी म्यूजियम चलते हैं.
मौसम का आकर्षण और गांधी की बात.. दोनों को नकार नहीं सकी. गाड़ी ने म्यूजियम का रुख कर लिया. बाहर वीरानगी और भीतर नीरवता. अंदर प्रवेश करते ही गांधी युग में कदम रख दिया. हर जगह गांधी. कहीं छोटे से बच्चे के रूप में तो कहीं महामानव के अवतार में. अपने दौर पर छा जानेवाले गांधी का चश्मा, घड़ी, नकली दांत सब सम्मोहित कर रहे थे. फिर एक बड़े हाॅल में गांधी की हत्या के निशान! उस स्पेशल ट्रेन की रेप्लिका जिसमें उनका कलश रखकर राख बहाने ले जाया गया था. वो कपड़े जो लहू से लाल हुए. वो दुखभरे अंतिम संदेश जो दुनिया के हर कोने से भारत सरकार के पास आए.

इसके बाद पुस्तकालय गए. दोनों के हाथों में हाथ मगर गांधी भी जैसे लाठी टिकाते साथ ही चल रहे थे. इक्का-दुक्का कोई कहीं बैठा पन्ने पलट रहा था. गांधी और किताबें दोनों पर ही धूल जमी है. कोई नहीं पोंछता. मैं और वो भटकते रहे. कभी इस किताब को उठाया तो कभी उस किताब को. आखिर बाहर आ गए. गाड़ी के पास पहुंचे. पेड़ों से धूप जगह बनाकर जमीन पर पड़ रही थी. गीली मिट्टी धीमे-धीमे सूख रही थी. ना जाने क्यों मैं बोल पड़ा.. सुनो.. यहां कितनी शांति है ना.. अच्छा है.. अगर हमारी शादी हो गई तो बूढ़ा होने पर मैं यहीं पढ़ने आया करूंगा. मुस्कुराते हुए उसने कहा- हां इससे अच्छी जगह तो पढ़ने के लिए नहीं मिलेगी.
हम ऊपर-ऊपर बोल भले ही कुछ रहे थे लेकिन गांधी की स्मृतियों को दिल्ली की एक सड़क के यूं किनारे लगा देने पर जरा हताश थे. मैं मन में सोच रहा था कि यूरोप के किसी शख्स ने अगर गांधी को जाना होगा और भारत को गांधी के देश के तौर पर पहचाना होगा तो यहां आकर शायद उसे झटका लगे. दो-एक लोग, स्टाफ और एक प्रेमी जोड़ा.. कुल जमा यही हिस्से में आया उनके..
(साढ़े तीन इश्क और गांधी)

इश्क में ताज़ा नाकाम हुए दोस्त को ख़त

इश्क में ताज़ा नाकाम हुए मेरे प्रिय दोस्त,
मुझे यकीन है कि तुम मेरा ये खत ज़रूर पढ़ोगे। ताज़ा ब्रेक अप से उबरने की कोशिश कर रहे तुम जैसे लोग मन बहलाने के लिए इन दिनों में वो सब करते हैं जो गर्लफ्रेंड के रहते नहीं करते। उन दिनों तुम मेरे फोन नहीं उठाते थे और अक्सर मैसेज पढ़ना भी भूल जाते थे। देख रहा हूं कि आजकल क्विक रिस्पॉन्स करने की तुम्हारी क्षमता फिर लौट आई है। देखो ये अच्छा ही है। अब उन बातों पर ध्यान दो जिन पर पहले दे नहीं पाए थे। वैसे आज कल पुरानी फिल्मों और पुराने गानों को भी तुम ठीकठाक वक्त दे रहे होंगे। मेरी सलाह है कि इमोशनल फिल्म और गानों से कुछ दिन दूर रहो। ग़म हलका करने की बजाय ये उसे गहरा कर देते हैं। मेरी मानो तो कहीं घूम फिर आओ। होता-वोता कुछ है नहीं मगर आदमी खुद को किसी ट्रैजिडी फिल्म का हीरो सा फील करने लगता है और हीरो कौन नहीं होना चाहता!!
एक बात और लिखनी थी। देखो यार, उस लड़की का नंबर डिलीट कर दो। ये तो मैं भी जानता हूं कि तुम्हें वो मुंहज़ुबानी याद नहीं होगा। आजकल हर चीज़ सेव हो जाती है तो नंबर रटने का फालतू काम कौन करे। नंबर डिलीट कर दोगे तो उसके दो फायदे होंगे। एक तो तुम्हारा मन जब-जब उसे कॉल करने का होगा तो तुम कॉन्टेक्ट लिस्ट में जाकर ठिठकोगे नहीं। दूसरा ये कि वॉट्सएप पर उसे ऑनलाइन देखकर अंदाजा़ लगाने से बच जाओगे कि वो किस से चैट कर रही है। फेसबुक से तो उसने ही तुम्हें ब्लॉक कर दिया है तो उधर की अब फिक्र ही मत करना। बीच-बीच में वो अनब्लॉक कर तुम्हें देखेगी और इससे पहले कि तुम्हारा ध्यान उसकी प्रोफाइल पर जाए तुम फिर ब्लॉक कर दिए जाओगे। वैसे भी आजकल पहले ब्लॉक करना ईगो का इश्यू बन गया है। मुहब्बत में भी घमंड बचा लेते हैं लोग। अच्छा वो सारे फोटो भी एक साथ सेलेक्ट करके मिटा देना। इनसे अब खुशी नहीं मिलेगी बल्कि पुराना टाइम ही ज़्यादा आएगा। उसे भूलने की कोशिश करनी है तो पुराना टाइम याद करने से बचना पड़ेगा। मुश्किल है पर कर लोगे।
शराब कम ही पीना। हम पहले उसकी कसम खिलाकर तुम्हें पिला देते थे पर अब उसकी कसम खिलाकर रोक भी नहीं सकते। ऑफिस जाते रहो। 8-10 घंटे सब नॉर्मल होने की एक्टिंग करोगे तो भी ठीकठाक टाइमपास हो जाता है। चाहो तो उस लड़की से बात करके देख लो जिसने तुम्हें ढाई महीने पहले प्रोपोज़ किया था। क्या मालूम अभी उसकी कश्ती किनारे ना ही लगी हो। ना-ना ये नहीं कह रहा कि फिर रिलेशनशिप में पड़ो। बस ये चाहता हूं कि ब्रेकअप के बाद जैसे लड़के अचानक सब लड़कियों से नफरत करने लगते हैं ऐसा मत करना। लड़कियों से बातचीत करते रहो। तुम पाओगे कि ज़ख्म लगाने और मरहम करने दोनों में ही वो सबसे अच्छी हैं।
ऐसे तो यार तुमने भी हमेशा उससे अच्छा व्यवहार ही किया हो ये मैं नहीं लिखूंगा। कैसे लिखूं.. तुम्हें गुस्से में उसे गालियां देते, झूठ बोलते और फॉर ग्रान्टेड लेते देखा है मगर दोस्त के कुछ फर्ज़ होते हैं। अभी मेरा फर्ज़ तु्म्हारे घाव पर फाहा रखने का है, ना कि लापरवाही से चोट खाने पर डांटने और नसीहत करने का। लड़की वो बुरी नहीं थी। लड़के तुम भी बुरे नहीं हो। बस अधिकतर रिलेशनशिप ऐसे ही होते हैं। चलो, छोड़ो। दर्शन शास्त्र में तुम्हारी कभी रुचि नहीं रही औऱ ना पढ़ने में.. इसलिए ना ज्ञान दूंगा और ना लैटर और लंबा करूंगा। कभी मन करे तो मेरे पास चले आना। साथ में फिल्म-विल्म देख आएंगे। गर्लफ्रेंड के चक्कर में हमने तुमने काफी मिस किया। अगली मिलने तक दोनों भाई इंजॉय कर लेंगे।
तुम्हारा..
तजुर्बेकार दोस्त!!