मंगलवार, 8 जुलाई 2014

गुज़र चुके सब मौसम

गुज़र चुके सब मौसम सूखा पेड़ होकर रह गया
हज़ारों यादों के पत्तों का मैं ढेर होकर रह गया

हर एक किस्से के साथ मैं कुछ पीछे छूटता रहा
सियाह-रातों की ना हुई जो वो सहर हो कर रह गया

तुम करती रही मुझसे मुहब्बत ये ही गनीमत थी गुलाब
मेरी वफा का असर ज़िंदगी पर तुम्हारी ज़हर जैसा हो गया

सूने-वीरान घर की दीवारों पर भटकती हो कोई बेल जैसे
मेरी कमससाती रुह के लिए जिस्म ही जेल जैसा हो गया

हंसते-गाते गुज़रते थे काफिले बरसों पहले जहां से
उस शहर का उजड़ना तूफानों के लिए खेल जैसा हो गया


रविवार, 6 जुलाई 2014


किस्से दिल्लगी के सुनाता रहा मैं..

मुझे रोता ना देखे कोई .. मज़ाक अपना उड़ाता रहा मैं
ग़म ना कहे किसी से.. किस्से दिल्लगी के सुनाता रहा मैं

महफिलें हुई कब किसी की जो मिला खंज़र लिए मिला
भीड़ से निकला तो हर बार पीठ के ज़ख्म छुपाता रहा मैं

शहरों की चमक कस्बों की चाल गांव का रंग भी देखा है
हर जगह से ऊबा और अल्लाह की मर्ज़ी बताता रहा मैं

एतबार की कीमत मैंने चुकाई हैं अकेले में रोकर गुलाब
किसी पर भरोसा करने से मुद्दतों खुद को बचाता रहा मैं 

वो कहते रहे कि अब मिले हो तो आओ कुछ अपनी भी कहो
कुछ तो कहता क्या आंसू के समंदर कोरों में छिपाता रहा मैं

(6-7-2014... सुबह 4.40)