बुधवार, 27 दिसंबर 2017

जब चंद्रास्वामी ने ब्रिटेन के अगले पीएम की भविष्यवाणी की..

साल 1975 की गर्मियां थीं। कुंवर नटवर सिंह ब्रिटेन में उन दिनों भारतीय उप उच्चायुक्त के तौर पर काम कर रहे थे। इस पद पर नौकरी करनेवाले के पास कई ज़िम्मेदारियां होती हैं, जिनमें से एक है अपने देश से आए नामी-गिरामी लोगों की मुरादें पूरी करना। नटवर सिंह को नहीं मालूम था कि इन गर्मियों में उन्हें एक 27-28 साल के तांत्रिक की मेज़बानी अनमना होकर ही सही लेकिन करनी पड़ेगी। वो दौर राजस्थान के तांत्रिक चंद्रास्वामी के उभार का था। नौजवानी के दिनों में ही वो ना सिर्फ अपने क्षेत्र में नाम कर चुके थे बल्कि सियासी जमात में भी वो जाना पहचाना नाम थे, हालांकि उनका सुनहरा दौर अभी आना बाकी था।



बहरहाल, चंद्रास्वामी ने लंदन पहुंचकर नटवर सिंह से मुलाकात की। फिर एक दिन उन्हें और उनकी पत्नी को भोजन पर बुला लिया। इस मुलाकात में चंद्रास्वामी अपनी विद्या के बल पर नटवर सिंह की पत्नी को प्रभावित करने में कामयाब रहे। हां, नटवर सिंह को चंद्रास्वामी के तौर तरीके कुछ खास पसंद नहीं आए। कुछ ही दिन बाद भारत के विदेशमंत्री वाई बी चव्हाण कुछ देर के लिए लंदन के हीथ्रो पहुंचे। नटवर सिंह मुलाकात के लिए वहां गए। बातचीत के दौरान नटवर सिंह ने चव्हाण को बताया कि चंद्रास्वामी मुझसे लॉर्ड माउंटबेटन और मार्गरेट थैचर से मुलाकात करने की गुज़ारिश कर रहे हैं। चव्हाण ने नटवर की उम्मीद के खिलाफ जाते हुए इन मुलाकातों के लिए हरी झंडी दे दी। नटवर सिंह फंस चुके थे। मन मारकर उन्होंने भारत के आखिरी अंग्रेज़ गवर्नर जनरल रहे माउंटबेटन को फोन मिला दिया। माउंटबेटन ने मुलाकात की इच्छा तो जताई लेकिन साथ ही खेद भी प्रकट कर दिया क्योंकि वो अगले ही दिन छुट्टी मनाने के लिए उत्तरी आयरलैंड के लिए रवाना हो रहे थे। नटवर सिंह को राहत ही मिली। उन्होंने चंद्रास्वामी को बता दिया कि माउंटबेटन से मुलाकात संभव नहीं है। ज़रा मायूस हुए युवा चंद्रास्वामी ने थैचर से मिलने की इच्छा जताई। उस वक्त मार्गरेट थैचर इंग्लैंड की विपक्षी कंज़र्वेटिव पार्टी की नेता नियुक्त हुई थीं। नटवर सिंह मुलाकात कराने को लेकर यूं भी मन से तैयार नहीं थे लेकिन उनके सामने संकट था। उन्हें डर था कि अगर मुलाकात के दौरान युवा तांत्रिक ने कोई अभद्र या असभ्य व्यवहार कर डाला तो वो खुद भी थैचर के सामने बेवकूफ नज़र आएंगे। बहरहाल, नटवर सिंह ने समय मांगा और वो मिल भी गया। थैचर को नटवर सिंह ने चंद्रास्वामी का संक्षिप्त परिचय दे दिया था लेकिन थैचर समझ नहीं पा रही थीं कि आखिर चंद्रास्वामी उनसे मिलना क्यों चाहते हैं। सच तो ये है कि थैचर की भी उस मुलाकात में कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन भारतीय उपउच्चायुक्त की तरफ से आए निवेदन पर उन्हें दस मिनट खर्चने में कोई बुराई नहीं लगी। अगले हफ्ते नटवर सिंह चंद्रास्वामी को लेकर हाउस ऑफ कॉमंस के दफ्तर पहुंच गए। हाउस ऑफ कॉमंस को आप ब्रिटेन की लोकसभा समझें। थैचर वहीं एक छोटे से कार्यालय में बैठती थीं। चंद्रास्वामी ने मुलाकात से पहले पूरी तैयारी कर ली। साधु का पूरा वेष धर कर उन्होंने माथे पर चौड़ा तिलक लगाया। हाथ में छड़ी ले ली और गले में रुद्राक्ष की माला डाल ली। नटवर सिंह चंद्रास्वामी के इस रंग ढंग से बहुत असहज महसूस कर रहे थे, लेकिन चंद्रास्वामी तो अपनी धुन में मस्त पूरे आत्मविश्वास से लबरेज़ होकर शाही गलियारों में चल रहे थे। लोग उन्हें देख रहे थे और चंद्रास्वामी इस बात का आनंद उठा रहे थे।
दोनों थैचर के कमरे में पहुंचे। उनके संसदीय सचिव एडम बटलर भी कमरे में मौजूद थे। जान पहचान का छोटा सा दौर चला जिसके बाद शायद मार्गरेट थैचर ने मुलाकात जल्दी निबटाने के इरादे से सीधे पूछ लिया कि चंद्रास्वामी उनसे मिलना क्यों चाहते थे...
अंग्रेज़ी से अनजान तांत्रिक चंद्रास्वामी के लिए अनुवादक का काम नटवर सिंह को करना था। चंद्रास्वामी जल्दी में भी नहीं थे। उन्होंने इत्मीनान से कहा- जल्द ही आपको पता चल जाएगा। थैचर ने इस अजीब से तांत्रिक को देखकर कहा- मैं इंतज़ार कर रही हूं। घड़ी की सुइयां अपनी गति से बढ़ रही थीं। मुलाकात के लिए दस मिनट का वक्त मुकर्रर हुआ था। चंद्रास्वामी अपनी अदाओं से वक्त खत्म कर रहे थे। कुछ देर में चंद्रास्वामी ने एक पेपर और पैन की मांग की। इसके बाद उन्होंने कागज़ फाड़कर थैचर के हाथ में पांच पर्चियां पकड़ा दीं और कहा कि वो कोई भी पांच अलग अलग सवाल इन पर्चियों में लिखकर रख लें । नटवर सिंह थैचर के चेहरे पर चिढ़ का एक हल्का सा भाव देख पा रहे थे लेकिन कुछ कर पाने में असमर्थ थे। चंद्रास्वामी फॉर्म में थे। उन्होंने सवाल लिखी पर्चियों को मुचड़कर गेंद जैसा बना देने को कहा। अब चंद्रास्वामी ने थैचर से कहा कि वो पांचों में से एक पर्ची खोलकर अपना सवाल देख लें। थैचर ने देखा और उधर चंद्रास्वामी ने हिंदी में बताया कि थैचर ने लिखा क्या था। नटवर सिंह ने अनुवाद कर दिया। थैचर के चेहरे से अचानक चिढ़ गायब होने लगी। उसकी जगह अब उत्सुकता थी। ज़ाहिर है, चंद्रास्वामी का निशाना ठीक लगा था। इसके बाद अगला सवाल भी चंद्रास्वामी ने ठीक बताया। चौथे सवाल तक आते-आते तो थैचर की भाव भंगिमा पूरी तरह से बदल गई थी। चंद्रास्वामी का उम्दा प्रदर्शन नटवर सिंह की लाज बचा रहा था। अब तक थैचर अपने सोफे के किनारे तक आ पहुंची थीं। चंद्रास्वामी ने भी संकोच छोड़कर अपनी चप्पेलें उतारीं और सोफे पर पद्मासन में जम गए। नटवर सिंह को कुछ बुरा लगा लेकिन वो थैचर को देखकर हैरान थे क्योंकि अब चंद्रास्वामी के तेवर उन्हें परेशान नहीं कर रहे थे। वो तो अब उनसे और सवाल करना चाहती थीं, लेकिन अब बारी चंद्रास्वामी की थी। कुछ जवाब देने के बाद अचानक चंद्रास्वामी ने बड़ी ही अदा से घोषणा कर दी कि अब वो किसी सवाल का जवाब नहीं देंगे क्योंकि सूर्य अस्त हो चुका है। बेचारे नटवर सिंह इस बात का अनुवाद करने से पहले झेंप गए। वो विपक्ष की नेता के सामने बैठे थे और चंद्रास्वामी अब तेवर दिखाने पर आमादा थे। खैर, नटवर सिंह ने इस बात का भी अनुवाद कर डाला। एक बार फिर नटवर सिंह के हैरान होने की बारी थी। मार्गरेट थैचर उनसे चंद्रास्वामी के साथ एक और मुलाकात का निवेदन कर रही थीं। नटवर सिंह इस पासा उलट के लिए कहां तैयार थे, मगर चंद्रास्वामी तो चंद्रास्वामी थे। उन्होंने कहा- मंगलवार को दोपहर ढाई बजे नटवर सिंह जी के घर पर।
ब्रिटेन की आला नेता को इस तरह वक्त दिए जाने की ढीठता पर नटवर की नाराज़गी दबी नहीं रही। उन्होंने चंद्रास्वामी को हरकतों से बाज़ आने को कहा और बोले कि वक्त देने से पहले कम से कम थैचर से उनकी सुविधा तो पूछ लो, आखिर ये हिंदुस्तान तो नहीं है, लेकिन अब चंद्रास्वामी कहां मानने वाले थे। उन्होंने नटवर सिंह से कहा- कुंवर साहब, अनुवाद कर दीजिए और फिर देखिए। नटवर सिंह खुद कहते हैं कि मैं तो हैरत में ही पड़ गया जब थैचर ने मेरे घर का पता पूछा , लेकिन अभी हैरान होने का सिलसिला पूरा नहीं हुआ था। चलने से पहले जाने कहां से चंद्रास्वामी ने अपने हाथ में ताबीज़ निकाल लिया। बोले कि इनसे कहिए जब मुझसे मिलने आएं तो ये ताबीज़ बाईं बाजू में पहनकर आएं। नटवर सिंह गुस्से से धधक रहे थे। उन्हें लग रहा था कि किसी ना किसी बेवकूफी पर डांटा ही जानेवाला है। साफ कह दिया कि इस देहाती बकवास का अनुवाद मैं नहीं करनेवाला। थैचर ने हस्तक्षेप करते हुए पूछा कि साधु महाराज क्या कह रहे हैं। बेचारे नटवर सिंह ने सहमते हुए कहा - मैं माफी चाहता हूं मिसेज थैचर लेकिन चंद्रास्वामी चाहते हैं कि आप इस ताबीज़ को अपनी बाईं बाजू में बांधकर आएं।
थैचर ने चुपचाप वो ताबीज़ लेकर रख लिया। चंद्रास्वामी और नटवर सिंह ने अब थैचर से जाने की अनुमति मांगी मगर चंद्रास्वामी को ना जाने क्या सूझा कि फिर बोले- कुंवर साहब, कृपया थैचर जी से कहिए कि मंगलवार को उन्हें लाल रंग की पोशाक पहननी चाहिए। अब नटवर सिंह बिलकुल सहने के मूड में नहीं थे। उनका मन हुआ कि वहीं चंद्रास्वामी की पिटाई शुरू कर दें लेकिन वो फंस चुके थे। उन्होंने चंद्रास्वामी को समझाया कि किसी महिला को उसके पहनावे के लिए कुछ कहना अभद्रता है। थैचर हिंदी में हो रही बातचीत नहीं समझ पा रही थीं लेकिन दोनों के चेहरे देख ज़रूर रही थीं। ना चाहते हुए भी नटवर सिंह ने फर्श की तरफ ताकते हुए अनुवाद कर डाला। अगले मंगलवार दोपहर ठीक ढाई बजे ब्रिटेन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी की नेता और भविष्य में इंग्लैंड की आयरन लेडी बननेवाली मार्गरेट थैचर नटवर सिंह के घर के दरवाज़े पर खड़ी थीं। वो ना लाल पोशाक पहनना भूली थीं और ना ताबीज़ बांधना। गदगद चंद्रास्वामी ने उस दिन थैचर के ना जाने कितने सवालों के जवाब खुशी खुशी दिए। फिर थैचर ने असली सवाल पूछा कि वो कभी प्रधानमंत्री बन सकेंगी या नहीं... चंद्रास्वामी ने उन्हें निराश नहीं किया। कहा- आप पीएम बन जाएंगी और नौ, ग्यारह या तेरह साल तक पद पर रहेंगी।
थैचर को अपने पीएम बनने पर तो यकीन था लेकिन उन्हें कार्यकाल की अवधि ज़्यादा लगी। खैर, उन्होंने आखिरी सवाल पूछा । वो जानना चाहती थीं कि वो पीएम बनेंगी कब तक। तांत्रिक चंद्रास्वामी के पास इस सवाल का भी जवाब था, उन्होंने कहा- अगले साढ़े तीन साल में। ठीक साढ़े तीन साल बाद थैचर अपने देश की प्रधानमंत्री बनीं और वो भी ग्यारह साल के लिए।
खैर, इस मुलाकात के बाद जब थैचर 1979 में पीएम बनकर कॉमनवेल्थ समिट में भाग लेने ज़ांबिया के लुसाका पहुंचीं तो नटवर सिंह भी वहीं थे। जब थैचर ने नटवर सिंह और उनकी पत्नी से मुलाकात की तो नटवर धीरे से फुसफुसाए- “Our man proved right.”
थैचर पल भर के लिए घबराई हुई दिखीं। नटवर सिंह को तुरंत अलग ले जाकर बोलीं, हाई कमिश्नर महोदय, हम इस बारे में बात नहीं करेंगे। नटवर सिंह ने भी अदब से जवाब दिया- कतई नहीं करेंगे प्राइम मिनिस्टर साहिबा, कतई नहीं।
इति इतिहास श्रृंखला
(नटवर सिंह की किताब Walking with Lions — Tales from a Diplomatic Past और इंडियन एक्सप्रेस ऑनलाइन से साभार)








गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

इस गांव की दीवारें बोलती हैं..

आपको कैसा लगेगा अगर आप बराक ओबामा के कंधे पर हाथ रखकर अपने मुहल्लेभर की कहानियां उसे सुनाएं और वो ध्यान से सुनें भी। आप कैसा महसूस करेंगे जब डोनाल्ड ट्रंप को एक गाय के सामने भाषण देते हुए देखेंगे। ब्रिटिश पीएम थेरेसा मे को आप मुस्कुराते हुए अपने ही गांव के किसी गड़रिये के घर में घुसते देखेंगे तो कैसा महसूस करेंगे और ये भी सोचिए कि आपके सामने एक कोने में इंदिरा और फिदेल कास्त्रो बैठकर किसी मुद्दे पर चर्चा में मग्न हैं। 

बुल्गारिया के एक नन्हें से गांव स्टैलो झेलेज़ेर में ये सब कुछ हो रहा है। भेड़ बकरी और गाय पालनेवाले गांव वालों के लिए ये सब पहले नया था लेकिन अब यहां रहनेवाले चार सौ गांव वालों के लिए ये सब रोज़ की बात हो चुकी है। अब बाहर से भी लोग इस गांव में ये करामात देखने के लिए पहुंचने लगे हैं। विंसिस्लैव येन्कोव नाम के शख्स ने यूरोप के सबसे गरीब देशों में से एक बुल्गारिया के इस गांव को बदहाली से लड़ने का ये नया हथियार दिया है। दरअसल स्ट्रीट आर्टिस्ट येन्कोव ने पूरे गांव को ओपन एयर पिक्चर गैलेरी में बदलकर रख दिया है। मकानों की दीवार पर दुनिया भर केदिग्गजों के चित्र देखकर हर कोई पहले तो हैरत में पड़ गया। फिर धीरे धीरे गांव वालों ने अपनी दीवारों पर भी उन्हें चित्र बनाने का न्यौता दिया। येन्कोव और उनके पेंटर छात्रों ने मकान मालिकों को दुनिया भर की मशहूर हस्तियों के साथ दीवारों पर पेंट कर दिया। भोले भाले गांव वालों की हसरतें दीवार पर उभरीं तो आसपास के इलाके में चर्चा फैल गई। जो पर्यटक बुल्गारिया आ रहे थे उन्हें भी इसकी भनक लगी। गांव के चर्च को बिग बेन में बदलना हो या फिर किसी राजनीतिक दिग्गज की हवा निकालनी हो यहां सब कुछ मौजूद है। दलाई लामा, पोप, इंग्लैंड की महारानी, अल्बर्ट आइंस्टीन.. आप नाम लीजिए वही हस्ती किसी ना किसी दीवार पर हंसते, गुस्साते या बतकही करते नज़र आएगी। इन हस्तियों के साथ आपको नज़र आएंगे उसी गांव के लोग। येन्कोव की पत्नी कैटरीना गांव में पल रही इस कला को अलग ही निगाह से देखती हैं। उनका कहना है कि गांवों में दुनिया की हर समस्या का निदान है। शहर में इंसान एक दूसरे का शोषण करते हैं लेकिन गांव इसके एकदम उलट हैं। गांव में लोग एकदम सच्चे हैं जबकि शहर की कॉरपोरेट दुनिया में मुनाफा सबसे ऊपर है और पॉलिटिकल करेक्टनस सबसे बड़ी चीज़ हो गई है। कैटरीना कहती हैं कि हमारे लिए इस गांव के लोग सबसे ज़्य़ादा अहमियत रखते हैं। मज़ेदार बात तो ये है कि इस गांव के लोग दीवार पर बनाए गए सभी सेलिब्रिटीज़ को नहीं पहचानते। हां, वो पेंटिंग में एक-दूसरे को आसानी से ढूंढ लेते हैं। वैसे मीडिया के ज़रिए ये गांव खासा मशहूर हो चुका है और जो लोग टीवी या अखबार में इन पेंटिंग्स को देख चुके हैं वो तो सेलिब्रिटीज़ के साथ बैठे गांव वालों के चेहरों को भी पहचानने लगे हैं। कितनी ही बार हुआ है जब किसी पर्यटक ने गांव की गली से गुज़रते गरीब चरवाहे को इसलिए रोक लिया क्योंकि चारपाई पर बैठे अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ उसकी पेंटिंग वो ना जाने कितनी बार देख चुका। ऐसे में पर्यटकों के लिए ये गांव वाले भी सेलिब्रिटी बन चुके हैं।


 40 साल पहले इस गांव में इंदिरा गांधी और फिदेल कास्त्रो का आना हुआ था। उसकी याद में गांव के चर्च की दीवार पर इन दोनों को भी पेंट कर दिया गया। हाल फिलहाल चल रहे राजनीतिक मुद्दों पर भी दीवारों को पेंट किया जाता है। वैसे सभी गांव वाले शुरू में इस आर्ट को लेकर उत्सुक नहीं थे। देखादेखी चलन बढ़ता गया और अब तो हर गर्मी में जब पोलैंड से येन्कोव आते हैं तो उन्हें खुद को पेंट करने की फरमाइशें करते गांव वाले मिल जाते हैं। पर्यटकों की आवाजाही से भी गांव वालों की दिलचस्पी बढ़ गई है। कैटरीना यही सब देखकर पूरे भरोसे से कहती भी हैं कि गांवों का भविष्य नज़दीक ही है।
(रेडियो बुल्गारिया और डेली मेल से जुटाई जानकारी पर आधारित) 









बुधवार, 13 दिसंबर 2017

याद रहेगा.. एक कास्त्रो था..

1983 साल था, महीना मार्च का। दिल्ली से सर्दी विदा हो चुकी थी लेकिन 140 देशों से मेहमानों का आना जारी था। इंदिरा गांधी और नटवर सिंह के कंधों पर सातवें गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भारी ज़िम्मेदारी थी। नटवर इस सम्मेलन के सेक्रेटरी जनरल थे इसलिए वो खासतौर से परेशान थे। जल्दबाज़ी में भारत को मेज़बानी मिली थी और ये उन पर था कि वो किसी तरह कार्यक्रम को कामयाबी से निपटा दें। अचानक उन्हें खबर मिली कि फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के नेता यासिर अराफात नाराज़गी में वापस लौटना चाहते हैं। नटवर सिंह के तो हाथ पांव ही फूल गए। नाराज़गी की वजह जाननी चाही तो पता चला कि जॉर्डन के शाह को पहले भाषण देने का मौका मिलने की वजह से अराफात गुस्सा गए थे। नटवर सिंह अराफात के तेवरों से परिचित थे। जानते थे कि वो उनके मनाने से नहीं माननेवाले। उन्होंने तुरंत इंदिरा गांधी से विज्ञान भवन आने की विनती की जहां आयोजन हो रहा था। नटवर सिंह ने उनसे फिदेल कास्त्रो को भी साथ लेते आने को कहा। फिदेल कास्त्रो पहुंचे और यासिर अराफात को फोन करके बुलाया। नाराज़ अराफात से फिदेल ने पूछा कि वो इंदिरा गांधी को अपना दोस्त मानते हैं या नहीं.. 
अराफात ने तपाक से कहा कि वो मेरी दोस्त नहीं, बड़ी बहन हैं। बस, कास्त्रो को मौका मिल गया, बोले- फिर छोटे भाई की तरह बर्ताव करो और सम्मेलन में हिस्सा लो। यासिर अराफात दोनों का ही बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने ज़िद छोड़ दी और सम्मेलन में हिस्सा लिया। इसी सम्मेलन के दौरान एक फोटो बहुत ही मशहूर हुआ। ये फोटो तब लिया गया जब फिदेल कास्त्रो ने इंदिरा गांंधी को गले लगा लिया। फिदेल कास्त्रो जवाहरलाल नेहरू की बहुत ज़्यादा इज़्ज़त करते थे और इसीलिए इंदिरा के प्रति उनका विशेष स्नेह था।

एक किस्सा नटवर सिंह बताते हैं। वो 1982 में क्यूबा की राजधानी हवाना गए थे। उनके ऊपर 1983 के गुटनिरपेक्ष सम्मेलन के आयोजन की ज़िम्मेदारी थी। 1979 में क्यूबा ये आयोजन कर चुका था इसलिए वो वहां जाकर कुछ टिप्स लेना चाहते थे। उन्होंने क्यूबा जाकर फिदेल कास्त्रो से मुलाकात का समय नहीं मांगा था लेकिन अचानक ही दौरे के आखिरी दिन उन्हें कहा गया कि फिदेल आपसे मिलना चाहते हैं। सकुचाते हुए नटवर सिंह उनके सामने जा पहुंचे। फिदेल कास्त्रो ने उनसे सीधा पूछा- 'ये गोरखा कौन हैं और ये फॉकलैंड में क्या कर रहे हैं ?' दरअसल उस वक्त फॉकलैंड द्वीपसमूह में गोरखा लोग ब्रिटेन की तरफ से अर्जेंटीना को ज़बरदस्त टक्कर दे रहे थे। नटवर सिंह ने कास्त्रो को गोरखाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी और बताया कि वो बेहद बहादुर योद्धा हैं जो अधिकतर नेपाल से आते हैं लेकिन ब्रिटिश आर्मी के लिए वो इतने अहम हैं कि वहां आज भी गोरखा रेजिमेंट है। इसके बाद नटवर सिंह ने पूछा कि फिदेल कास्त्रो गोरखाओं को लेकर जिज्ञासु क्यों हैं तो उन्होंने पर्वतारोही मॉरिस हरज़ोग की किताब अन्नपूर्णा के बारे में बताया जिसमें गोरखाओं का ज़िक्र था। किताब फिदेल कास्त्रो ने पढ़कर खत्म ही की थी।
नटवर सिंह ने एक बार फिदेल कास्त्रो से जवाहरलाल नेहरू और उनकी पहली मुलाकात के बारे में पूछा। फिदेल ने बताया कि साल 1960 में जब वो संयुक्त राष्ट्र संघ की 15वीं सालगिरह पर न्यूयॉर्क पहुंचे तो कोई होटल उन्हें कमरा देने को तैयार नहीं था। एक दिन के लिए तो वो क्यूबा के दूतावास में रुक गए लेकिन अगले दिन उन्होंने अपनी नाराज़गी संयुक्त राष्ट्र महासचिव डैग हैमरशोल्ड के सामने ज़ाहिर कर दी। फिदेल ने साफ कहा कि या तो मेरे और मेरे लोगों के रहने का इंतज़ाम कीजिए वर्ना संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रांगण में मैं तंबू डालकर रहूंगा। इस चेतावनी के बाद उन्हें हारलेम के एक होटल ने रहने की जगह दे दी गई। फिदेल कास्त्रो ने नटवर सिंह को बताया कि हर जगह उनके साथ किए गए इस व्यवहार पर खबरें बन रही थीं। जैसे ही फिदेल कास्त्रो को होटल में कमरा मिला उनसे मिलने सबसे पहले जवाहरलाल नेहरू आए। 34 साल के नौजवान फिदेल कास्त्रो अमेरिकियों के इस व्यवहार से निराश थे पर नेहरू ने उनका हौसला बढ़ाया। खुद कास्त्रो ने नटवर सिंह से कहा कि वो उस वक्त नेहरू के दिए हौसले को ज़िंदगी भर नहीं भुला सके। 

साल 1991 की बात है। सोवियत यूनियन बिखर गया था। क्यूबा का अमेरिका से झगड़ा रहा था इसलिए अमेरिका ने उस पर तमाम तरह के प्रतिंबध लगा रखे थे। क्यूबा कितने ही देशों से खाना वगैरह नहीं ले सकता था। ऐसे में भूख से परेशान क्यूबा पर कम्यूनिस्ट नेता हरकिशन सिंह सुरजीत का ध्यान गया। उन्होंने पार्टी की तरफ से क्यूबा को दस हज़ार टन गेहूँ भिजवाने की ज़िम्मेदारी ले ली। लोगों से अनाज और पैसा जमा किया गया। सुरजीत ने पंजाब से गेंहू लदी विशेष ट्रेन कोलकाता बंदरगाह पहुंचाई। नरसिम्हाराव सरकार ने भी सुरजीत की अपील पर इतना ही गेहूं और मंगवाया और कैरिबियन प्रिंसेज़ नाम के जहाज पर लदवा दिया। दस हज़ार साबुन भी रखवाए गए। जब जहाज क्यूबा पहुंचा तो फिदेल कास्त्रो ने खासतौर पर सुरजीत को न्यौता भेजा। तब फिदेल कास्त्रो ने कहा था कि अब क्यूबा कुछ दिनों तक सुरजीत सोप और सुरजीत ब्रेड से ज़िंदा रहेगा।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल रहीं मारग्रेट अल्वा भी फिदेल कास्त्रो के साथ हुई अपनी मुलाकातों के बारे में बताती हैं। उन्होंने एक मज़ेदार किस्सा बीबीसी को बताया था। उन्होंने बताया कि एक बार भोज के बाद फिदेल कास्त्रो ने उनसे उनका वज़न पूछा। अल्वा ने कहा कि मैं आपको अपने वज़न के बारे में क्यों बताऊं। हमारे यहाँ भारत में कहावत है कि उस चीज़ के बारे में हरगिज़ न बताया जाए जिसे साड़ी छुपा सकती है। इससे कई पाप छुपाए जा सकते हैं।
अल्वा की बात पर फिदेल कास्त्रो ज़ोर से हंसे और उनकी कमर पर हाथ रखकर बोले कि मैं तुम्हें उठाकर भी बता सकता हूं कि तुम्हारा वज़न कितना है। अल्वा ने फिदेल को ऐसा करने से मना किया। बोलीं- यॉर एक्सलेंसी आप ऐसा मत करिए. आप जितना सोचते हैं उससे मैं कहीं ज़्यादा भारी हूँ। इससे पहले कि वाक्य पूरा हो पाता अल्वा ज़मीन से एक फ़ुट ऊपर थीं। फिदेेल कास्त्रो ज़ोर से हंसे और बोले- अब मुझे मालूम है कि तुम्हारा वज़न कितना है। अल्वा बेचारीं शर्म से लाल हो गईं।
मारग्रेट अल्वा एक और किस्सा बताती हैं। एक बार फिदेल कास्त्रो ने उनसे पूछा कि स्पेनिश लोग क्यूबा में न उतर कर यदि भारत में उतरे होते तो इतिहास क्या होता? (कोलंबस ने क्यूबा खोजा था जबकि वो भारत खोज रहा था)। अल्वा ने तुरंत कहा कि तब आप भारतीय होते। ये बात सुनते ही फिदेल कास्त्रो ठहाका लगाने लगे। ज़ोर -ज़ोर से मेज़ थपथपाकर बोले कि ये मेरे लिए खुशकिस्मती की बात होती! भारत एक महान देश है।

मारग्रेट अल्वा का ही कहना है कि फिदेल कास्त्रो को काफी पहले ये पता चल गया था कि वीपी सिंह ने राजीव गांधी की कुर्सी पलटने की तैयारी कर ली है।अल्वा उस वक्त मैक्सिको गई थीं और जल्दबाज़ी में क्यूबा पहुंची थीं। ये वो दौर था जब वीपी को राजीव के बहुत करीब माना जाता था। फिदेल कास्त्रो की खुफिया एजेंसी बहुत तेज़ तर्रार थी और माना जाता है कि उसने ही कास्त्रो तक खबर पहुंचाई थी। मारग्रेट अल्वा ने ये बात अपनी किताब 'करेज ऐंड कमिंटमेंट' में लिखी है कि फिदेल कास्त्रो ने उनसे कहा था कि स्वदेश लौटकर राजीव को कहना कि अपने वित्तमंत्री पर भरोसा ना करें। वो खतरनाक है और भरोसे के काबिल नहीं है। वो राजीव की पीठ में छुरा घोंपेगा। बहरहाल मारग्रेट अल्वा ने उन्हें उलटा समझाने की कोशिश ही की। बाद में अल्वा ने ये बात राजीव को बताई तो राजीव भी हंसे और उल्टे मारग्रेट अल्वा से सवाल किया कि कास्त्रो भारत के बारे में क्या जानते हैं? आगे चलकर जब वीपी ने अपनी चाल चल दी तब मारग्रेट अल्वा ने राजीव को फिदेल कास्त्रो की चेतावनी याद दिलाई। वे चुप रह गए। 
(जानकारी वन लाइफ इज़ नॉट एनफ,करेज ऐंड कमिंटमेंट, इंडियन एक्सप्रेस और बीबीसी से )
(इति इतिहास श्रृंखला)

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

क्यूबा के आसमान पर चमकता सूरज

एक दौर में जो नायक होता है वही बदले दौर का खलयनाक होता है। भारत में इंदिरा हों या पाकिस्तान में ज़िया.. हर कोई लोकप्रियता के दौर के बाद एक वक्त के लिए नायक से खलनायक में तब्दील हुआ ही है। कुछ ऐसा ही भारत से 13 हज़ार किलोमीटर दूर बसे क्यूबा नाम के देश में हुआ। फुलगेन्शियो बतिस्ता नाम का नायक सालों के शासन के बाद बतौर खलनायक अपने देश से भाग निकला। भागने से पहले उसने जितनी हो सकता था उतनी दौलत अपने DC-4 विमान में भर ली। उसने डोमिनियन रिपब्लिक में जाकर शरण ली जहां उसका तानाशाह दोस्त सत्ता पर काबिज़ था। वो तारीख 1959 की 1 जनवरी थी। इसके बाद क्यूबा के आसमान पर जो सूरज चमका उसका नाम फिदेल कास्त्रो था। साल 2008 तक कास्त्रो ही क्यूबाई आसमान पर चमक बिखेरते रहे।
कास्त्रो ने क्यूबाई क्रांति की शुरूआत महज़ 82 साथियों के साथ की थी जिनमें सिर्फ 12 ही सरकारी गोलियों का शिकार होने से बच सके थे। इन 12 लोगों ने 25 महीनों के भीतर ही सारे क्यूबा को अपने उद्देश्य से सहमत करा लिया और 80 हज़ार की सेना के मालिक बतिस्ता को भागने पर मजबूर कर दिया। फिदेल कम्युनिस्ट कम थे, क्यूबाई राष्ट्रवादी ज़्यादा थे। ये अलग बात है कि उनकी अधिकतर नीतियां समाजवादी थीं और खुद भी एक वक्त के बाद वो कम्युनिस्ट हुए ।हां, उनका छोटा भाई राउल और मशहूर क्रांतिकारी साथी चे ग्वेरा ज़रूर शुरू से कट्टर कम्युनिस्ट थे। 
फिदेल कास्त्रो से अमेरिका की चिढ़ शीतयुद्ध के ज़माने से थी। क्यूबा का दावा है कि अमेरिका की सीआईए ने 600 से भी ज़्यादा बार उन्हें जान से मारने की कोशिश की। इन कोशिशों में उनके सिगार में ज़हर मिलाने से लेकर उनकी पूर्व प्रेमिका को ज़हरीला कैप्सूल लेकर उनके पास भेजना तक शामिल रहा। नौ अमेरिकी राष्ट्रपति आए और गए लेकिन कास्त्रो क्यूबा पर जमे रहे। एक बार अर्जेंटीना के मशहूर फुटबॉलर डिएगो माराडोना ने कास्त्रो की तारीफ कर दी। अमेरिका ने चिढ़ में उन्हें वीज़ा देने से मना कर दिया। बाद में उन्हें 8 दिन का वीज़ा दिया गया लेकिन उनके साथियों को दस साल का वीज़ा मिला था।
फिदेस कास्त्रो का भारत से हमेशा मीठा रिश्ता रहा। नेहरू के गुटरनिपेक्षता के सिद्धांत के वो कायल थे। इंदिरा के साथ भी उनकी मुलाकातें हमेशा गर्मजोशी से भरपूर रहीं। कास्त्रो के मंत्री के तौर पर चे ग्वेरा भी क्रांति के कुछ ही महीने बाद भारत के दौरे पर आए थे। मैंने कहीं कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी का कास्त्रो संग मुलाकात का एक किस्सा पढ़ा था। यहां साझा करता हूं। येचुरी ने ज्योति बसु के साथ 1993 में क्यूबा का दौरा किया था। डिनर करने के बाद दोनों सोने जा रहे थे कि फिदेल कास्त्रो ने उन्हें मुलाकात का बुलावा भेजा। आधी रात को बैठ कर कास्त्रो ने दोनों नेताओं से डेढ़ घंटे की मुलाकात की। इस बातचीत में कास्त्रो ने उनसे भारत में पैदा होने वाले कोयले और लोहे को लेकर इतने सवाल किए कि ज्योति बसु ने बगल में बैठे येचुरी से बंगाली में बेचारगी से पूछा- क्या ये हमारा इंटरव्यू ले रहे हैं...
बसु को आंकड़े याद नहीं थे और कास्त्रो इस बात को समझ रहे थे। उन्होंने येचुरी से कहा कि ज्योति बसु बूढ़े हो चुके हैं लेकिन आपको तो आंकड़े याद होने ही चाहिए। इसके बाद येचुरी जब भी क्यूबा गए अपने साथ भारत से जुड़े तमाम आर्थिक आंकड़ों का हिसाब किताब लेकर ही गए।
इसी तरह जब बसु और येचुरी भारत लौटने के लिए हवाना के हवाई अड्डे पर बैठे थे तो अचानक कास्त्रो उन्हें विदाई देने के लिए आ गए। कास्त्रो ने कंधे पर बैग लटकाए येचुरी से पूछा कि इसमें क्या है। येचुरी ने उन्हें बताया कि बैग में कुछ किताबें हैं। कास्त्रो ने इसके बाद येचुरी को कहा कि उनके सामने कभी कोई बैग लेकर नहीं आता क्योंकि उसमें कुछ भी हो सकता है और सीआईए उन्हें मारने की कोशिश करती रहती है। येचुरी ने भी कास्त्रो का ध्यान उनकी पिस्तौल की तरफ दिलाते हुए कहा कि आपके पास पिस्तौल है। अगर कोई आप पर हमला करे तो आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। बदले में कास्त्रो मुस्कुराए और बोले- आज तुम्हें राज़ की बात बताता हूं। ये पिस्तौल मैं अपने दुश्मनों को डराने के लिए पास रखता तो हूं मगर इसमें कभी गोली नहीं रखी।
नोबेल पुरस्कार विजेता पाब्लो नेरूदा ने फिदेल के लिए जो कुछ लिखा है उसकी चार पंक्तियां लिखकर बात खत्म कर रहा हूं।
हम तुम्हारे साथ हैं: क्योंकि तुम प्रतीक हो
हमारे दुर्धर्ष संघर्षों के, सामूहिक शौर्य के
अगर क्यूबा लड़खड़ाएगा, हम सब गिरेंगे
हम उसे संभालने को आगे बढ़ेंगे।
(इति इतिहास श्रृंखला)